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मंगलवार, दिसंबर 20, 2011

हमारे सर पे भी एक आसमान रहता है



हमारे सर पे भी एक आसमान रहता है 
दुआओं सा जो कोई निगहेबान रहता है 

तुम नमाज़ी हो तो क्या समझोगे कभी 
खुदा काफिरों पे कहाँ मेहरबान रहता है 

इस तन्हा शब् को जिसकी याद आती है 
सहर की नमी में उसका निशान रहता है 

उसके आँचल की छाँव ना हो जब तलक  
घर, घर नहीं बनता बस मकान रहता है 

बिछड़कर के मरते तो नहीं हैं हम दोनों 
हाँ, बस जिन्दा रहने का गुमान रहता है 

कुछ और नहीं है ये एहतियातों के सिवा 
जो फासला दोनों के दरमियान रहता है 

मंगलवार, दिसंबर 13, 2011

रह गयीं हैं अब कहाँ बहार की बातें




जीत की बातें हैं, ना हैं हार की बातें 
इश्क में हैं तो दर्द बेशुमार की बातें 

वो मौसमों के हसीं निखार की बातें 
रह गयीं हैं अब कहाँ बहार की बातें 

वीराने घर के और ये दीवार-ओ-दर 
आज भी करते हैं इंतज़ार की बातें 

अपना बना के जबसे छोड़ गया वो 
लगती हैं बेजा सी ऐतबार की बातें 

शाम तन्हाई जो उसकी याद चले है  
आँखें करती हैं फिर फुहार की बातें 

ख्यालों की वादी का 'राज़' ग़ज़ल में 
चनाब की बातें कुछ चनार की बातें 

मंगलवार, नवंबर 29, 2011

बस बे-सबब यूँ ही फिरा करना




बस बे-सबब यूँ ही फिरा करना 
हमे भी नहीं है पता क्या करना 

हवा तेज़ है कुछ तूफ़ान भी है 
चरागों की हक में दुआ करना 

हमसे ना सही औरों से ही सही
पर यूँ किसी से तो वफ़ा करना 

देना नाम उसे ग़ज़ल का मगर 
लफ़्ज़ों में उसको लिखा करना 

दर्द समझोगे तब ही तुम मेरा 
मेरे जैसे कभी तो हुआ करना 

बस अपनों में शुमार कर लेते 
कब कहा बन्दे को खुदा करना 

घुटन भरी है जिन्दगी अपनी 
कुछ इधर बाद-ए-सबा करना 

तहरीर-ए-लब से हंसी लिखना 
अश्क आँखों से ना जुदा करना 

है ये इनायत इश्क के बुखार की




कुछ और नहीं, है ये इनायत इश्क के बुखार की 
के सभी कुछ हो मगर, जाए ना जान बीमार की 

मुहल्ले की हर खबर तो इन लुगाईयों के पास है 
क्या जरुरत रह जाए है फिर घर में अखबार की 

उसको भी शौक नहीं है अपना गाँव छोड़ देने का 
शहर में खींच लाती है बस ये वजह रोजगार की 

आज-कल तो चापलूसों का ही ज़माना रह गया 
कद्र ही कहाँ रह गयी है अब अच्छे फनकार की 

बुतों को पूजने वाले और नमाज़ी भी जानते हैं 
खुदा भी ना ले सकेगा जगह माँ के किरदार की 

सब मिलता है बाज़ार में बस यही नहीं मिलती 
दुआएं लेने की औकात नहीं किसी खरीददार की

मेरे लफ़्ज़ों की गहराइयों तक उतरे कौन भला 
सबको बातें मेरी लगती हैं बस यूँ ही बेकार की 

सन्नाटों में शोर उतर आया होगा जब



.
सन्नाटों में शोर उतर आया होगा जब 
बाद मुददतों कोई घर आया होगा जब 

रौशनी ने कुछ दम भर साँस ली होगी 
चराग आंधी से गुजर आया होगा जब 

उसने कीमत में जिंदगी लगा दी होगी 
इश्क में वो सौदा कर आया होगा जब 

माँ के आँचल की छाँव याद आती होगी 
गाँव छोड़कर के शहर आया होगा जब 

लफ्ज़ सफहों पे नमी लेकर उतरे होंगे 
के अब्र यादों का इधर आया होगा जब 

हर आहट उसकी आमद लगती होगी 
नींद में उसका असर आया होगा जब 

चंद क़दमों के फासले मीलों लगे होंगे 
कोई तन्हा सा सफ़र आया होगा जब 

शुक्रवार, नवंबर 18, 2011

बाद मुद्दतों के जैसे अपने घर चले




बाद मुद्दतों के जैसे अपने घर चले
उनकी यादें जब हम छोड़ कर चले 

अदालत-ए-हुस्न में वो मुक़र चले 
वफ़ा के सब इल्जाम इस सर चले  

यूँ हम छोड़ दें ये हँसना-रोना तक 
अपने दिल पे इख्तियार गर चले 

यहाँ जज्ब बयानी ही करते रहे हैं 
इस ग़ज़ल में कब कोई बहर चले 

खुद ही बुझ थे गए चराग खामोश 
हवा सोचती रही, किस डगर चले 

मय ने आदतें बिगाड़ी है जिनकी  
उनपे नसीहतों का कब हुनर चले 

कब तलक यूँ इश्क का मातम हो 
जैसे भी है जिंदगी बस गुज़र चले 

कहें 'राज़' की सोहबत नहीं अच्छी 
बदनाम ही सही यहाँ नाम पर चले  

गुरुवार, नवंबर 10, 2011

ये ग़ज़ल मेरी....



दर्द-ओ-अलम का समाँ ये ग़ज़ल मेरी 
है मेरी तन्हाई की जुबाँ ये ग़ज़ल मेरी 

इसके हर मिसरे में छुपी रुदाद भी है 
मेरे ज़ख्मों का है निशाँ ये ग़ज़ल मेरी 

ये लफ्ज़ सुलगते हैं यादों में किसी की 
तो बनके उठती है धुआँ ये ग़ज़ल मेरी 

किसी महके ख्याल जैसी लगे है कभी 
है कभी खंडहर सा मकाँ ये ग़ज़ल मेरी 

बहार आयी ना हो आगोश में जिस के
उसी पतझर का है बयाँ ये ग़ज़ल मेरी 

'राज़' नासमझ को भी समझ लेना यूँ 
कहाँ मीर, ग़ालिब कहाँ ये ग़ज़ल मेरी 

बुधवार, नवंबर 02, 2011

जिस रोज़.....




तो आँखों में अश्क उतर आयेंगे उस रोज़ 

तेरी कोई ग़ज़ल लेकर आयेंगे जिस रोज़ 


हम उन्हें भी लफ़्ज़ों के पैकर में ढाल देंगे 

तेरी याद के नक्श उभर आयेंगे जिस रोज़ 


मेरे दोस्तों फिर बद्दुआ देना तुम मुझको 

इस दिल के ज़ख्म भर आयेंगे जिस रोज़ 


फिर रौशन होंगे यहाँ पे हौसलों के चराग 

रकीब लेके हवाएं इधर आयेंगे जिस रोज़ 


और माँ की दुआएं उसे याद आएँगी बहुत 

छोड़ कर के गाँव, शहर आयेंगे जिस रोज़ 


तब ''राज़'' की भी ईद-ओ-दिवाली मनेगी

भुलाकर रंजिशें वो घर आयेंगे जिस रोज़ 

बुधवार, सितंबर 28, 2011

अब नजर नहीं आता दस्तूर-ए-रहनुमाई यारों



भर गयी है इन्सां में कुछ इस कदर बुराई यारों 
अब नजर नहीं आता दस्तूर-ए-रहनुमाई यारों 

और जो क़त्ल हुए थे कल रात मजमे में देखो 
कोई और नहीं वो, थे हमारे--तुम्हारे भाई यारों 

चनार के सब बाग़ हैं झुलसे और चनाब रोये है 
किसने वादी में फिर से यूँ दहशत मचाई यारों 

संगीनों के साए में तो अपना साया भी न दिखे 
क्या खुदा रहा वो और क्या उसकी खुदाई यारों 

बस बात मजहब की, जबाँ की चलती है वहां 
आता नहीं नज़र कहीं पे गोशा-ए-भलाई यारों 

सियासतदानों से उम्मीद करना भी बेमानी है 
क्या अब तलक कभी उन्होंने है निभाई यारों 

कहकहों से घर की वीरानियाँ हों फिर से रौशन 
ले आओ तुम ही कुछ भाई-चारे की दवाई यारों 

*गोशा-ए-भलाई - अच्छा करने का अंदेशा 

मंगलवार, सितंबर 20, 2011

रहे हम बस फकीर के फकीर देखिये



इश्क में रांझे की ये तकदीर देखिये 
मिली नहीं कभी उसको हीर देखिये 

शबे-रुखसत को आसमाँ भी बरसा 
किस किस को हुई थी, पीर देखिये 

ग़ज़ल फिर बेहद खूबसूरत सी लगे 
उसके जिक्र से बनी तहरीर देखिये 

उम्रभर दुआ में बस उसे माँगा किये 
रहे हम बस फकीर के फकीर देखिये 

बात जज्बों से पागलपन तक जाए 
आईने में जो उसकी तस्वीर देखिये 

मुहब्बत की असीरी भी अच्छी लगे 
लगे अच्छी जुल्फ की जंजीर देखिये 

वफ़ा के जज्बे पे कुर्बान जाइए "राज़" 
कहते हैं यही ग़ालिब-ओ-मीर देखिये

उससे जो रुखसत की घडी थी



ना जाने कैसी अजीब बड़ी थी 
उससे जो रुखसत की घडी थी 

मेरे बगैर उदास ना रहना तुम 
शर्त उसने तो रख दी कड़ी थी 

इक तरफ उसकी ख़ुशी तो थी 
इधर दिल को अपनी पड़ी थी 

आंसुओं का सैलाब थमा नहीं 
जबके पूरी अभी रात खड़ी थी 

कब तलक अश्क पैहम थमते
चश्म तो बस खामोश अड़ी थी 

सुर्ख शबनम हमारी देख कर 
सहर उस शब् से खूब लड़ी थी

जिंदगी की राह में कई इम्तेहान भी आयेंगे



जिंदगी की राह में कई इम्तेहान भी आयेंगे 
उसे पा लेने और खोने के गुमान भी आयेंगे 

इस मरासिम पे ज़माने को भी ऐतराज़ रहा 
कुछ लोग उसके--मेरे दरमियान भी आयेंगे 

ज़र्रा ज़र्रा ज़मीं का जब करेगा रक्स यूँ ही 
देखने को दूर कहीं से आसमान भी आयेंगे 

इश्क की राह आसान समझ ना मुसाफिर 
बहारें भी मिलेंगी तो बियाबान भी आयेंगे 

संजीदगी शहर में बढ़ जायेगी जिस रोज 
देखना फिर कुछ लोग परेशान भी आयेंगे 

लफ्ज़ हमारे होंगे और लहजा उसका होगा 
अबके ग़ज़ल में तो ऐसे सामान भी आयेंगे

शनिवार, सितंबर 17, 2011

ग़ज़ल बना दी इश्क, मुहब्बत, रुसवाई ने



मीठा मीठा इक दर्द उठाया है तन्हाई ने 

जिक्र जो उसका छेड़ दिया है पुरवाई ने


हँसता है गर दरिया, खुश ना जानो तुम 

जाने कितना दर्द छुपा रखा है गहराई ने


हिचकी भी मुझको अब ना आती उतनी 

याद भी कम करवा दी शायद मंहगाई ने 


ये चाँद बहुत कम आँगन में आता है मेरे 

जाने क्या-२ सिखलाया है शब् हरजाई ने 


हमको लफ़्ज़ों की किमियागीरी नहीं पता 

ग़ज़ल बना दी इश्क, मुहब्बत, रुसवाई ने

बुधवार, सितंबर 14, 2011

खुशगवार से गम-गुज़ारों की बात है



शब्-जुगनू, चाँद-सितारों की बात है 
शायद इश्क के सब मारों की बात है

बयान लफ़्ज़ों में कर तो दूँ समझोगे 
ये मुहब्बत है यार इशारों की बात है

अब के रुत में फिर अजब रंग होगा 
सेहरा की जानिब बहारों की बात है 

उसका मेरी जिंदगी में होना कुछ यूँ 
जैसे दरिया के दो किनारों की बात है 

हिज्र, तन्हाई, ये अश्क और रुसवाई 
बस मैं और मेरे कुछ यारों की बात है 

मेरी ग़ज़ल के किरदारों में देख लेना 
खुशगवार से गम-गुज़ारों की बात है 

रविवार, सितंबर 11, 2011

तेरी दुआ से कितनी बरकत है आजकल




शब् की तो अच्छी सियासत है आजकल
घर को तीरगी से ही मुहब्बत है आजकल

उसे भूल चुके हैं पर हिचकियाँ नहीं जातीं
दिल की ये भी अजीब हरकत है आजकल

ख्वाब. खलिश, चुभन, दर्द, यादें, बेबसी
इश्क में लगी कैसी तोहमत है आजकल

सोते से बेसबब ही जाग पड़ता हूँ मैं यूँ ही
नींद में जाने कैसी ये वहशत है आजकल

और हमारे आँगन में भी दरिया बरसा करे
पर खुदा की कहाँ हमपे रहमत है आजकल

अपनी परेशानी में ही इजाफा करते हैं बस
देख तेरी दुआ से बहुत बरकत है आजकल

शनिवार, सितंबर 10, 2011

आँखें......


दिल के दर्द-ओ-गम का बयान हैं आँखें
कभी ज़मीं तो कभी आसमान हैं आँखें

जाने क्या क्या अफसाने लिखे हैं इनमे
कौन कहता है इबारत आसान हैं आँखें

कुर्बत के लम्हों में खिलते गुलाब के जैसी
हिज्र के मौसम में होती बियाबान हैं आँखें

जब से गया है वो मरासिम तोड़ कर सारे
उसकी याद में रहती बहुत परेशान हैं आँखें

जब तक हैं खामोश तो खामोश ही रहेंगी
जिद पे आ जाएं तो फिर तूफ़ान हैं आँखें

गुरुवार, सितंबर 08, 2011

मेरी तरह वो शख्स भी तन्हा बहुत है



ये बात और है के आजकल हँसता बहुत है 
पर मेरी तरह वो शख्स भी तन्हा बहुत है 

उसकी इबादत करूँ तो क्यूँ हैराँ है ज़माना
उसका चेहरा जो खुदा से मिलता बहुत है 

उसके इंतज़ार में तो यूँ सदियाँ गुजार देंगे 
उसकी याद का हमे इक-2 लम्हा बहुत है 

मजबूरे-हालात था जो वफ़ा न कर सका 
मेरी निगाह में मगर वो अच्छा बहुत है 

"तुम मेरी जिन्दगी से कहीं जा नहीं रहे"
उसका मुझसे इतना बस कहना बहुत है 

ग़ज़ल के लिए 'राज़' नए उन्वाँ क्या लायें 
बस इक उसका नाम ही लिखना बहुत है 

शुक्रवार, सितंबर 02, 2011

दीवाने को तो सब अच्छा लगे है



हर इक चेहरे में तेरा चेहरा लगे है 
हिज्र में मुझको सब सेहरा लगे है 

मेरी हर सदा नाकाम लौट आयी
मुझे तो ये खुदा भी बहरा लगे है 

जाग उठा हूँ अचानक सोते-सोते 
शायद तेरी याद का पहरा लगे है 

खारों से रफाकात हुयी है जब से 
इन फूलों का ज़ख्म गहरा लगे है 

इस किनारे से उस किनारे तलक 
ये दरिया भी बहुत प्यासा लगे है 

उसकी हंसी पे मत जाइए "राज़"
दीवाने को तो सब अच्छा लगे है 

मंगलवार, अगस्त 16, 2011

खूबसूरत लफ़्ज़ों का फ़कीर नहीं हूँ मैं...



सच है के ग़ालिब, जौक, मोमिन, मीर नहीं हूँ मैं 
हाँ, पर खूबसूरत लफ़्ज़ों का भी फ़कीर नहीं हूँ मैं

मेरे जज्बों की भी कद्र होगी तुम मेरे बाद देखना 
क्या हुआ, जो के, नीरज, राहत, बशीर नहीं हूँ मैं 

मेरे कहे पे तो सुलग उठता है ये ज़माना ही सारा 
क्या करूँ आदतन मजबूर जो हूँ, कबीर नहीं हूँ मैं 

बहुत नाजुक, बहुत मासूम है, अंदाजो-बयां मेरा 
छू कर देखो मोम हूँ, कोई दहकता तीर नहीं हूँ मैं 

माना की ग़ज़ल है तीखी ये और कड़वे हैं शेर मेरे 
पर अहसास मेरे भी दिल में हैं, बे-पीर नहीं हूँ मैं 

शनिवार, अगस्त 13, 2011

फिर से मोहब्बत के वो ज़माने आ जाएँ



फिर से मोहब्बत के वो ज़माने आ जाएँ 
गर कैस जैसे कुछ और दीवाने आ जाएँ 

कभी वो बे-हिजाब बाम पे चल क्या पड़े  
ये चाँद सितारे सब जश्न मनाने आ जाएँ 

कोई परिंदा छत पे भले चहके ना चहके 
पर जिसे चाहें वो किसी बहाने आ जाएँ 

गर हो फलक के अब्र से बूंदों के करिश्मे 
सहरा में भी फिर मौसम सुहाने आ जाएँ 

आँखों की तश्नगी को भी आराम हो नसीब 
याद जो उसकी, पलक छलकाने आ जाएँ 

शब्-ए-गम की इन्तेहाँ भी हो किसी रोज 
सुबहें खुशियों की जो मुस्कराने आ जाएँ 

बुधवार, अगस्त 03, 2011

पहले ज़ख्मों पर थोड़ा नमक लगा दीजिये



पहले ज़ख्मों पर थोड़ा नमक लगा दीजिये 
फिर जी भरकर आप मुझको दुआ दीजिये 

और कौन यहाँ काफिर है कौन है मुसलमाँ
कभी मिलें गर जो ये मुझे भी बता दीजिये 

मेरी तासीर आब जैसी है पता चल जाएगा 
बस इक बार खुद को मुझमे मिला दीजिये 

कभी जो आँखों में मेरी उसके ख्वाब मिले 
जो चोर की हो वो ही मुझको सज़ा दीजिये  

जिसे लग गया हो आजार-ए-इश्क यहाँ पे 
उसे फिर क्या दुआ दीजिये के दवा दीजिये 

मकता भी संभल जाएगा, खूब शेर जमेंगे  
फ़िक्र बहर की आप,ग़ज़ल से हटा दीजिये 

गुरुवार, जुलाई 21, 2011

"सुबह के ५ बजे और याद उनकी......."


07/07/2011 सुबह ५ बजे जब रात ढली नहीं थी और सहर चली नहीं थी...
यूँ ही जेहन के दरिया में किसी का ख्याल मचल गया.... 
लफ़्ज़ों की कश्ती को सफहों के साहिल पे उतार लाया था.....
वही आपकी पेश-इ-खिदमत है..... 
इसे पढ़ते समय वक़्त का ख्याल जरुर रखियेगा.. "सुबह के ५ बजे और याद उनकी......."




शब् की सुर्खी कुछ उतर जाए तो चली जाना 
खुशबु फूलों से यूँ बिखर जाए तो चली जाना

अभी भी आसमाँ पे चांदनी छिटकी है जरा सी 
सहर लेकर के इसे जो घर जाए तो चली जाना

देखो तो मौसम भी गुलाबी हुआ नहीं है अभी 
रंगत कुछ इसकी निखर जाए तो चली जाना

अभी तो ये लफ्ज़ अंगड़ाइयां ही ले रहे हैं मेरे 
ग़ज़ल इनसे कोई संवर जाए तो चली जाना

नहीं जाते ....



माँ की आँखों से फिर आसूं टाले नहीं जाते 
जब बच्चों के गले में दो निवाले नहीं जाते 

ताउम्र पाल-पोस कर जिनको, बड़ा किया 
बच्चों से वही बूढ़े माँ-बाप पाले नहीं जाते 

ये तो जिगर है अपना, जो रौशन हैं वो भी 
जुगुनुओं के घर तो कोई उजाले नहीं जाते 

अब के सियासत में यहाँ पे ग़द्दार बहुत हैं 
परचम वतन के जिनसे संभाले नहीं जाते 

बुलंदी अक्सर हौसलों से मिला करती है
समन्दर में यूँ ही मोती खंगाले नहीं जाते 

इश्क में खुद को परवाना कहते हैं वो पर 
वफ़ा में कभी शम्मा के हवाले नहीं जाते

और "राज" जैसे भी हैं ठीक ही हैं यहाँ तो 
क्या हुआ जो मस्जिद या शिवाले नहीं जाते

रविवार, जुलाई 17, 2011

शाम ढलती है जब कहीं पर बवाल रखती है


शाम ढलती है जब कहीं पर बवाल रखती है 
चेहरे पे वो अपने तो रंग सुर्ख लाल रखती है 

उतर जाए है शब् की थकान उसकी आमद से 
सहर अपने अंदर कुछ ऐसा कमाल रखती है 

गम मिलता है तो लिपट जाता है खुद ही खुद 
ख़ुशी आये है जब तो कितने सवाल रखती है 

क्या कह डालूं वफादारी की बात उसकी यारों 
वो पगली आज भी ख़त मेरे संभाल रखती है 

अपनी दुआओं में अब भी नाम लेती है मेरा 
खुद से भी ज्यादा वो तो मेरा ख्याल रखती है 

अपने हालातों को बयां किसी से करती नहीं 
हंसी की ओट में छुपाकर के शलाल रखती है 

लफ़्ज़ों को करीने से यूँ ही नहीं सजाते "राज़" 
ग़ज़ल ही बज़्म में मेरे दिल का हाल रखती है 

तेरे बिना.....


ऐसा नहीं के बहुत कुछ नहीं बदला तेरे बिना 
पर हयात का कारवां गुजर तो रहा तेरे बिना 

सुकूँ होता है दिन में, नींद भी आती है रात को
कट जाती है जिन्दगी कतरा-कतरा तेरे बिना  

अब्र याद का आये भी मगर बरसात नहीं होती 
खामोश ही रहता है आँखों का दरिया तेरे बिना 

और अब ख्यालों में इंतज़ार की शाम नहीं है  
वक़्त गुजरा वो भी, ये भी गुजरेगा तेरे बिना 

रस्मे-उल्फत निभाई पर तुझे पा ना सके हम 
इश्क से रहेगा उमर भर ये शिकवा तेरे बिना 



शुक्रवार, जुलाई 01, 2011

"आरज़ू" चाँद पाने की.....



दर्द का ये मंज़र भी इक रोज ठहर जाएगा 
मुसाफिर ही तो है कब तक किधर जाएगा 

अभी इन्हें छोड़ भी दो यूँ ही खुला रहने दो 
वक़्त बदलेगा सब ज़ख्मों को भर जाएगा 

रोज-ए-क़यामत जो कभी यूँ फैसला होगा 
इलज़ाम इश्क का दोनों के ही सर जाएगा 

और आज जो उकताया फिरे मुझसे बहुत 
कल हिज्र में मुझे ढूंढते इधर उधर जाएगा 

बहुत उड़ता है परिंदा आसमाँ में दूर तलक
थक गया जब कहीं तो लौट के घर जाएगा 

"आरज़ू" चाँद पाने की यूँ रख लो तुम "राज़" 
के हुआ कभी तो कोई सितारा उतर जाएगा 

रविवार, जून 19, 2011

इश्क में यूँ हर शख्स पागल नहीं होता



अहसास तेरा मुझको जिस पल नहीं होता 
साँसों का सिलसिला मुक़म्मल नहीं होता 

बस तेरी सूरत ही रक्स करती हैं आँखों में 
दूसरा चेहरा तो इनमे आजकल नहीं होता 

उसे आसान लगा है मुझको भूल जाना पर  
वो है के मेरी सोच से भी ओझल नहीं होता 

आजार-इश्क की यूँ कोई दवा नहीं मिलती 
चारागारों से भी तो मसला हल नहीं होता 

जब आँखों से बे-सबब अब्र का कारवां चले 
रोकने का फिर उसे कोई आँचल नहीं होता 

"राज़" खामोश हैं, तो क्या है अजीब इसमें 
अरे इश्क में यूँ हर शख्स पागल नहीं होता 

मंगलवार, जून 14, 2011

कोई हौसला ऐ हवा ना कर....



कहता हूँ कोई हौसला ऐ हवा ना कर 
मेरे चराग को बे-सबब छुआ ना कर 

सुलग उठते हैं उदासी से सफहे कई 
आंसुओं से ग़ज़ल को लिखा ना कर 

गर तेरे बस में नहीं है दुआ ना सही 
तू मगर किसी को भी बद्दुआ ना कर 

उसकी फितरत है ज़फायें तो रहने दे  
कौन कहता है तुझसे तू वफ़ा ना कर 

ये सख्त लोग हैं कैफियत ना समझे  
होकर यूँ मासूम जहाँ में रहा ना कर 

नज़र लग जाए ना कहीं डर है बहुत 
आईने में खुद को इतना पढ़ा ना कर 

सुना माह की नीयत भी अच्छी नहीं 
तो छत पे तन्हा उससे मिला ना कर 

वक़्त से पहले कुछ मिलता ना कभी    
किस्मत से बे-वजह यूँ गिला ना कर 

खुदा तेरी भी सुनेगा इक दिन "राज़" 
लिए ''आरज़ू'' अपनी यूँ फिर ना कर 

सोमवार, जून 06, 2011

बगैर सितारों का चाँद आसमान में देखो



बगैर सितारों का चाँद आसमान में देखो
हूँ तन्हा अब मैं बहुत इस जहान में देखो 

कौन आये जो मुझको दुआएं किया करे 
पड़ गए हैं आबले सबकी जुबान में देखो 

के छोड़  कर अब तो तेरा शहर हम चले 
है दर्दो-गम और तन्हाई सामान में देखो 

हो गयी है इक सिफर सी अब ये जिंदगी 
आ गए हैं कितने सवाल इंतेहान में देखो 

देख कर भी वो ना देखने का बहाना करे 
हो चले हैं कई फासले दरमियान में देखो 

सिवा उसके किसी के ख्याल नहीं बसते 
कोई और नहीं रहता इस मकान में देखो 

किसी की याद में बरसा है ये अब्र टूट के  
पे लोग खुश हैं बारिश के गुमान में देखो  

और ''आरज़ू'' है के पूरी नहीं होती "राज़" 
कोई नुक्स ही होगा अपने बयान में देखो 

Note:-जौन एलिया साहब की एक ग़ज़ल की ज़मीं से.....

गुरुवार, जून 02, 2011

तेरी कुर्बत-ओ-रफ़ाक़त के ज़माने चले



तेरी कुर्बत-ओ-रफ़ाक़त के ज़माने चले
जेहन से जब कभी तुझको भुलाने चले 

दिन भर फिरे बेसबब ही परिंदा लेकिन 
लौटकर वो शाम अपने ही ठिकाने चले

इश्क के कारोबार का है ये हासिल देखो 
नफे में बस दर्द-ओ-गम के खजाने चले 

इक तेरे दर पे ही है तेरे बंदे को आसरा 
ऐ खुदा तू बता कहाँ अब ये दीवाना चले 

फिर से दोस्तों पे ऐतबार कर लिए हम 
लो के एक धोखा और फिर से खाने चले 

हमने कोई शिकवा ना गिला रखा उनसे 
हाँ, उनके ना आने के हज़ारों बहाने चले 

उसे तो रास ना आयी थी ये ग़ुरबत मेरी 
जाविदाँ मुहब्बत में ऐसे भी फ़साने चले 

अपनी 'आरज़ू' ही तो कही है तुमने 'राज़'
बस ग़ज़ल है ये नई,पर जिक्र पुराने चले 

शनिवार, मई 28, 2011

आंसुओं में ही इक हंसी मिल जाए



आंसुओं में ही इक हंसी मिल जाए 
काश मुझे ऐसी ही खुशी मिल जाए 

एक मुद्दत से तरसी हैं आँखें बहुत 
बस इक जरा सी रौशनी मिल जाए 

मैं पागलों की तरह फिरता हूँ यहाँ 
शायद सुकूँ की जिंदगी मिल जाए 

कहती है वो अदू को बेहतर मुझसे 
आईने देखूं,शायद कमी मिल जाए 

कयामत तलक गुनाह कौन झेले 
के जो भी है सज़ा यहीं मिल जाए 

काफ़िर की दुआ पहुंचे खुदा के दर 
मानो आसमाँ से जमी मिल जाए 

अपने नसीब पे ''राज़'' भी करें फक्र 
पूरी जो वो 'आरज़ू' कभी मिल जाए 

रविवार, मई 22, 2011

उसे इंकार हो जितना वो करता रहे



के उसे इंकार हो जितना वो करता रहे 
दिल है के दिन रात उसपे ही मरता रहे 

मेरा इश्क तो है, मानिंद-ए-खुशबू कोई 
समेटूं जितना ये उतना ही बिखरता रहे 

मुझे पता है उसके दिल में है क्या छुपा 
सामने गर मुकरता है तो, मुकरता रहे 

रोज़ आयें उसकी हसरत ले के ये सितारे 
मुआ चाँद है के चौदहवीं तक संवरता रहे 

"राज़" लिख दें नाम ग़ज़ल में "आरज़ू"
सच है के हर लफ्ज़ फिर निखरता रहे 

मंगलवार, मई 17, 2011

बारिशों के मौसमों में पतंगें उडाई जाएँ



चलो के किस्मतें कुछ यूँ आजमाई जाएँ 
बारिशों के मौसमों में पतंगें उडाई जाएँ

उसकी इबादत में खुद को लगा रखो तुम 
कब जाने खुदा तक, तुम्हारी दुहाई जाएँ 

गिला-शिकवा ये जफा-वफ़ा क्या है यहाँ 
ऐसी बातें तो मुहब्बत में ना उठाई जाएँ 

कौन कहता है के वो भूल गया है मुझको 
अरे हिचकियाँ देखो आई जाएँ आई जाएँ 

तू मुझसे मैं तुझसे खफा हैं तो हुआ करें 
तमाम शहर को रंजिशें ना दिखाई जाएँ 

जब ना हो पूरी कोई "आरज़ू" तेरी "राज़"
अपनी हसरतें आईने को ही सुनाई जाएँ 

शनिवार, मई 14, 2011

अब जिंदगी इम्तेहान जैसी है



मुझे लगती बियाबान जैसी है 
अब जिंदगी इम्तेहान जैसी है 

ज़मीं की खाक है औकात मेरी  
वो लड़की तो आसमान जैसी है 

फितरते-दिल को क्या कहिये 
किसी परिंदे की उड़ान जैसी है 

हर रोज दर्द ले के बढ़ जाती है  
अब ये सांस भी लगान जैसी है 

तुझे सोचता हूँ तो टूट जाता हूँ 
तेरी याद तो बस थकान जैसी है 

बिना सिक्कों से ये चलती नहीं 
के रिश्तेदारी भी दुकान जैसी है 

मौत तो मुक्क़मल ही हैं यहाँ पे 
अपनी रूह ही बे-ईमान जैसी है 

माँ की दुआ ही परदेस में यारों 
सुकून-ओ- इत्मिनान जैसी है 

'राज़' कहें क्या 'आरज़ू' अपनी 
यहाँ पे वही तो पहचान जैसी है 

शुक्रवार, मई 13, 2011

इश्क से जब भी वो उकताए फिरेंगे



बेचैन रहेंगे कुछ, कुछ घबराए फिरेंगे 
यूँ इश्क से जब भी वो उकताए फिरेंगे 

काज़ल से करेंगे वो शामो के करिश्मे 
चाँद को चेहरे से फिर चमकाए फिरेंगे 

सखियाँ जो छेड़ देंगी कभी नाम से मेरे 
छुप जायेंगे कहीं पे और शरमाये फिरेंगे 

मौसम की रंगत होगी होठों से ही उनके
पैरहन की खुशबू से सब महकाए फिरेंगे 

रखेंगे नाम-ए-'आरज़ू' ''राज़'' जो उनका 
सच है के हर्फ़-ए-ग़ज़ल बल खाए फिरेंगे 

बुधवार, मई 04, 2011

फलक पे जो ये घटा सुहानी हुई जाती है



उसकी जुल्फों से ही शैतानी हुई जाती है 
फलक पे जो ये घटा सुहानी हुई जाती है 

के चांदनी बिखर के ज़मीं तलक आ गयी 
खामोश दरिया में इक रवानी हुई जाती है 

किसी चेहरे पे जाके नहीं टिकती हैं आँखें 
वही इक सूरत बस पहचानी हुई जाती है 

चली जाए जो बे-धड़क छत पे वो अपनी 
मुए चाँद को बहुत परेशानी हुई जाती है 

पकड़ लूँ हाथ जो सरे-राह कहीं मैं उसका 
शर्म से बस फिर पानी-पानी हुई जाती है 

मैं उसे खुदा कहूँ या करूँ इबादत उसकी 
क्यूँ यार तुम्हे इतनी हैरानी हुई जाती है 

"राज़" करे ना गर कहीं जिक्र-ए-''आरज़ू''
ग़ज़ल में जैसे कोई बेईमानी हुई जाती है 

सोमवार, मई 02, 2011

बे-बात पर ही खफा होगा ''राज़''



बे-बात पर ही खफा होगा ''राज़''
या शायद भूल गया होगा ''राज़''

नाम का ही तो काफिर था बस 
दिल में उसके खुदा होगा ''राज़''

वो शाम छत पे टहल गयी होगी 
चाँद सहर तक जगा होगा ''राज़''

हिचकियाँ रात भर आती रहीं यूँ 
किसी ने याद किया होगा ''राज़''

चल आईने से ही कुछ जिक्र करें 
उसको कुछ तो पता होगा ''राज़''

''आरज़ू'' को सबसे छुपा के रख ले 
नजर लगने का शुबहा होगा ''राज़''

शनिवार, अप्रैल 23, 2011

माँ की दुआओं को अपने सर रख लेना



माँ की दुआओं को अपने सर रख लेना 
परदेस जाना तो आँख में घर रख लेना 

कहाँ हासिल है शहर में ये सोंधी खुशबू
साथ गली की खाक मुश्त भर रख लेना 

पोंछ लेना आँखों को अपनी मगर तुम 
कुछ आईनों को भी साफ़ कर रख लेना 

जिंदगी में कुछ काम नहीं आया करता 
हौसलों से भरी कोई रहगुजर रख लेना 

बस छाँव ही नहीं, वो देता है बहुत कुछ 
आँगन में कोई बूढ़ा सा शजर रख लेना 

चाहना टूटकर के जिसे भी चाहना तुम
फासला दरमियाँ थोड़ा मगर रख लेना 

मानिंद-ए-चराग जलना ऊम्र भर को यूँ 
पर कुछ हवाओं का भी तो डर रख लेना 

उसका जिक्र भी हुआ तो महकेगी बहुत 
फिर चाहे ग़ज़ल 'राज़' बे-बहर रख लेना

रविवार, अप्रैल 17, 2011

हर शख्स अब तन्हा दिखाई देता है



देखिये जिसको भी वो रुसवा दिखाई देता है 
हाँ मुझे हर शख्स अब तन्हा दिखाई देता है 

खुबसूरत अब कभी मौसम नहीं होते कहीं 
हद तलक नज़रों में बस सहरा दिखाई देता है 

अब्र की वहशत में वो चाँद जबसे आ गया 
आसमाँ तबसे बड़ा ये गहरा दिखाई देता है 

नासमझ हूँ मैं यहाँ कैसे यकीं कर लूँ कहो
हर नए चेहरे पे इक चेहरा दिखाई देता है  

हिज्र में यूँ ही कहीं जो याद उसकी चल पड़े 
खुश्क आँखों में मेरी दरिया दिखाई देता है 

लुट चला है 'राज़' वो तो इश्क के ही नाम पे 
लोग कहते हैं उसे के पगला दिखाई देता है 

सोमवार, अप्रैल 11, 2011

इक गुनाह सा कर गया कोई



के इक गुनाह सा कर गया कोई
इस दिल से जो उतर गया कोई

उसे बस जाने की जिद पड़ी थी
क्या पता कहीं पे मर गया कोई

हवा ये बहकी बहकी फिरे देखो
शायद यहाँ से गुजर गया कोई

चांदनी शब् भर रोती रही यहाँ
इलज़ाम उसके सर गया कोई

खुद को ढूंढ़ते ये कहाँ आ गया
लौट कर जो ना घर गया कोई

उस गली के चक्कर नहीं लगते
शायद "राज़" सुधर गया कोई

रविवार, अप्रैल 03, 2011

बात निकलेगी.......



मेरी इन आँखों के समंदर की बात निकलेगी 
तब किसी संगदिल पत्थर की बात निकलेगी 

जज्ब-ए-कुर्बानी का जिक्र होगा कहीं पर जब 
देखना यारों के मेरे ही सर की बात निकलेगी 

मौसम-ए-सेहरा में होगा सब आलम ये कैसा 
ना समर, ना किसी शज़र की बात निकलेगी 

मुद्दत से हैं वीरान पड़ी इस शहर की बस्तियाँ 
किन अल्फाजों में मेरे घर की बात निकलेगी 

जब भी छिड़ेगा चर्चा कहीं दोस्तों के नाम का
पीठ मेरी तो उनके खंजर की बात निकलेगी

मेरी वफायें जाविदाँ और तेरी ज़फायें कमाल 
कुछ यूँ अब दोनों के हुनर की बात निकलेगी

और ग़ज़लों में अब नया हम क्या कहें "राज़" 
दिल, धड़कन, रूह, जिगर की बात निकलेगी

मंगलवार, मार्च 29, 2011

लफ्ज़ मेरा शायराना रह गया



आते-आते उनका आना रह गया 
दरमियाँ गुज़रा ज़माना रह गया 

कटी शब्-ए-इंतजार कुछ यूँ मेरी
के जुगनुओं से दोस्ताना रह गया

थी जिंदगी की हर कहानी बेअसर 
पर लफ्ज़ मेरा शायराना रह गया 

छोड़ कर आहों के परिंदे उड़ चले 
मौसम कहाँ अब सुहाना रह गया

शनिवार, मार्च 26, 2011

तुझसे कहते कैसे.....



रात अश्कों का आना जाना तुझसे कहते कैसे 
अपने दर्दो-गम का फ़साना तुझसे कहते कैसे

के तुझे फुर्सत नहीं गैरों की महफ़िल से मिली 
कुछ अपना दिल नहीं माना तुझसे कहते कैसे

हुआ ज़िक्र जो यूँ बे-वफाओं का तो खामोश रहे 
नाम तेरा भी था उनमे आना तुझसे कहते कैसे

तेरे गम लिए आँख रखीं पुरनम खुद की हमने 
हंसने का तो था बस बहाना तुझसे कहते कैसे

तेरे ख्यालों से ही थी मुक़म्मल तहरीर अपनी 
था ग़ज़लों का तू उन्वाँ जाना तुझसे कहते कैसे

तर्के-ताल्लुक नहीं कोई मरासिम नहीं ''राज़''
के नहीं रहा अब वो ज़माना तुझसे कहते कैसे

गुरुवार, मार्च 17, 2011

उसकी खुशबू का फिर से पता देती है


उसकी खुशबू का फिर से पता देती है 

ये सबा चलती है मुझको रुला देती है 

वो भी तड़पती है हिज्र में कहीं बहुत 
मेरे बाद जाने किस को सदा देती है 

वो आते हैं जो शाम तो सुकूँ पाती है 
शाख इक-इक परिंदे को दुआ देती है 

जबके गम में जीना सीख लेता हूँ मैं 
क्यूँ याद दर्द के शोले को हवा देती है 

रोया है वो रात भर तन्हाई में कहीं 
'राज़' ये शबनम सबको बता देती है 

गुरुवार, मार्च 10, 2011

बंदे बस बंदगी की रवायत में मिला करते हैं



कहाँ अब ये सच्ची इबादत में मिला करते हैं 
बंदे बस बंदगी की रवायत में मिला करते हैं 

छल फरेब झूठ से है यहाँ पर जिनका वास्ता 
ऐसे लोग ही बस सियासत में मिला करते हैं 

जिन्हें रखा है कौम की हिफाज़त की खातिर 
वही दंगाइयों की हिमायत में मिला करते हैं 

दोस्त कहके पीठ पे वार करना शगल उनका 
कुछ लोग ऐसी भी शराफत में मिला करते हैं 

जर्द हो मौसम तो खुद ही रास्ता तलाश करिए 
महरो-माह कहाँ ऐसी आफत में मिला करते हैं

रविवार, मार्च 06, 2011

सच बोलता है बहुत....



हाल-ए-दिल यूँ सभी से बताना नहीं यारों 
अपनों से पर कुछ भी छिपाना नहीं यारों 

और रूठा हुआ है वो तो मना लेना उसे भी 
बिछड़े गर तो, होता लौट आना नहीं यारों 

अपनी किस्मत से ही तुम खुश हो रहना 
चादर से ज्यादा पैर को फैलाना नहीं यारों 

महर-ओ-माह की यूँ ख्वाहिश बुरी नहीं है 
पर गैर की चीज़ पे नज़रें उठाना नहीं यारों 

थोडा तल्ख़ है क्यूंकि सच बोलता है बहुत 
" राज़ " की बातें दिल से लगाना नहीं यारों 

मंगलवार, मार्च 01, 2011

सबको दुआ दी जाए....



उसकी याद अपने जेहन से मिटा दी जाए 
के इस नादाँ दिल को भी यूँ सज़ा दी जाए 

परिंदों का जबके यहाँ आना नहीं मुमकिन 
क्यों ना दरख़्त की हर शाख जला दी जाए 

शब्-ए-इंतज़ार की देखो तो सहर हो चुकी 
चलो रौशनी चरागों की अब बुझा दी जाए 

निकल आये हैं जब उनकी हदों से दूर बहुत 
उसकी वफ़ा, उसकी खता सब भुला दी जाए 

जब भी इबादत में झुके ''राज़'' सर अपना 
दोस्त हो या दुश्मन, सबको दुआ दी जाए 

शनिवार, फ़रवरी 12, 2011

वस्ल की सदा ना लिखना



हिज्र है मुक्क़दर तो वस्ल की सदा ना लिखना 
जो यूँ चराग बख्शा है तूने, तो हवा ना लिखना 

कब करी ख्वाहिश मैंने किसी खजाने की यहाँ 
मेरी किस्मत तू कुछ उसके सिवा ना लिखना 

मुझे हासिल है दर्द में भी इक लज्जत अब तो 
ऐ खुदा अब कोई खुशियों की सबा ना लिखना 

मिल भी जाए गर मेरी पीठ पे यूँ खंज़र उसका 
के वो है मासूम, उसकी कोई खता ना लिखना 

हम अपनी आँखों को ही जला के रौशनी करेंगे 
मेरी खातिर महर-ओ-माह, दुआ ना लिखना 

निखर आएगा रंग सफहों पे अंदाजे-सुखन का 
नाम उसका ही लिखना, कुछ नया ना लिखना 

यूँ तो ग़ज़ल में मैंने अपने ख्याल उतारे रखे थे 
कुछ पता ना था क्या लिखना क्या ना लिखना 

मज़बूरी-ए-हालात की शायद वो रही थी मारी
कभी तुम "राज़" उसको यूँ बेवफ़ा ना लिखना

शनिवार, फ़रवरी 05, 2011

दर्द अपना कुछ मुख़्तसर निकला



दिल की बज़्म से हंस कर निकला 
दर्द अपना कुछ मुख़्तसर निकला 

जिसे अपने अजीजों में रखा मैंने 
खंज़र उसका ही पीठ पर निकला 

शब् यादों की तीरगी में कट गयी 
फिर माह क्या ता-सहर निकला 

तू नहीं गर तो तेरा ख्याल ही सही 
कोई तो अपना हमसफ़र निकला 

कुछ ख्वाब, वीरानी और वहशत 
यही सामान बस मेरे घर निकला 

देखीं थीं जिसने औरों में खामियाँ 
वो ''राज़'' खुद ही बे-बहर निकला 

गुरुवार, फ़रवरी 03, 2011

गर तेरी याद जरा टल गयी होती



गर तेरी याद जरा टल गयी होती 
तबियत अपनी संभल गयी होती 

माह आने का जो वादा ना करता  
रात भी चरागों में जल गयी होती 

तेरे ख्यालों से ही हर्फ़ सजे थे मेरे 
वरना कही कब ग़ज़ल गयी होती 

ग़मों ने ही तो संभाला है मुझको 
ख़ुशी होती तो निकल गयी होती 

काबिल मैं ही ना था शायद उसके 
नहीं तो किस्मत बदल गयी होती 

खामोश दरिया सा मैं लौट आया हूँ 
काश तश्नगी जरा मचल गयी होती 

क़ज़ा के खेल में जिन्दगी हार बैठी 
सोचता हूँ एक चाल चल गयी होती