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शुक्रवार, नवंबर 12, 2010

वो मेरा होकर भी मुझसे जुदा रहा


वो मेरा होकर भी मुझसे जुदा रहा 
जब भी मिला बस खफा खफा रहा 

क्या मौसम आये क्या बादल बरसे 
कहाँ ख्याल सर्द आहों के सिवा रहा 

वक़्त ने यूँ मिटा तो दी तहरीरें कई 
सीने का मगर, हर ज़ख़्म हरा रहा 

रात भर शमा अश्कों की जला करी 
सहर कब हुई, ना शब् का पता रहा 

खौफ तन्हाई का यूँ मेरे घर आ गया 
जो उसकी यादों से ही गले लगा रहा 

जिंदा तो हम रहे थे, साँसे भी चलीं थीं 
पर कब दिल सुकूं में उसके बिना रहा 

उठ-उठ कर रातों को रोया किये हम 
हश्र यही "राज़" उम्र भर को बपा रहा 

45 टिप्‍पणियां:

  1. लाजवाब ग़ज़ल है ... एक एक शेर जैसे एक एक अनमोल मोती ..

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  2. खूबसूरत गज़ल .. बेहतरीन

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  3. वाक़ई बेहतरीन ग़ज़ल... हरएक शे‘र उम्दा...बधाई।

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  4. वाह !! बहुत खूब ... हर शेर कमाल का है ...

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  5. सभी शेर एक से बढ़कर एक...... उम्दा रचना.....

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  6. behad hi sunder bhaw liye khubsurat rachna. aabhar.

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  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  8. अपना साथ ऐसे ही देते रहें....
    अच्छा कहने के लिए प्रेरणा मिलती है आपके शब्दों से....
    उम्मीद करता हूँ ये प्यार यूँ ही बना रहे...

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती पर उनको शत शत नमन!

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  10. आप सभी का आभारी हूँ जो अपने कीमती वक़्त दिया.....शुक्रिया

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  11. रचना जी और अवन्ती जी..शुक्रिया बहुत बहुत

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  12. लाजवाब प्रस्तुति. बहुत बधाई.

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  13. बहुत ख़ूबसूरत पोस्ट, आभार.

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  14. आप सभी का दिल से आभार.....

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  15. उत्तर
    1. बहुत सुन्दर सृजन , सादर

      पधारें मेरे ब्लॉग"meri kavitayen" पर भी , आभारी होऊंगा .

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  16. आप सभी का बहुत बहुत आभार..

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  17. वाह......क्या कहने बहुत खूब।

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  18. बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको

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  19. बहुत उम्दा ..सच कहा आपने

    आज की मेरी नई रचना जो आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार कर रही है

    ये कैसी मोहब्बत है

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  20. इस रचना के लिए हमारा नमन स्वीकार करें

    एक बार हमारे ब्लॉग पुरानीबस्ती पर भी आकर हमें कृतार्थ करें _/\_

    http://puraneebastee.blogspot.in/2015/03/pedo-ki-jaat.html

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