
इश्क में कुछ यूँ दिल पे असर होता है
शब् का आलम भी जैसे सहर होता है
तूफां से गुजरता है जब बेखौफ शजर
तब जाके कहीं शाखों पे समर होता है
तू क्या कहती है के, मैं जुदा हूँ तुझसे
चोट लगती है तुझे, दर्द इधर होता है
मिलते हैं कभी किताबों में गुलाब तेरे
रात भर फिर खुशबू का सफ़र होता है
मुहब्बत गुनाह ऐसा है, के उम्र भर रहे
बस कभी तेरे तो कभी मेरे सर होता है
कैसे यकीन मैं खुद की किस्मत पे करूँ
मुझे हर घडी तुझे खोने का डर होता है
सच है के सुकूँ बहुत मिलता है जान के
हिज्र का मातम जो अब तेरे घर होता है