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इक शाम उसकी आँखों से ढल रही होगी
हिज्र की रातों में वो बहुत मचल रही होगी...
है नाजुक बदन वो कुछ जियादा ही फिर भी
गम के चराग में रौशनी सी जल रही होगी...
महफिल में बेवजह मेरे नाम के जिक्र पर
सर्द आहें उसकी बर्फ सी पिघल रही होगी...
ना पूछेगी मौसमो से बहारों का वो पता
सेहरा की गर्म रेत पे खामोश चल रही होगी....
के वक़्त भी उसके इन्तेज़ार में रुक गया होगा
और वो हर आहट पे घर से निकल रही होगी...