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शुक्रवार, दिसंबर 31, 2010

शब् के साए से निकलना चाहता है


शब् के साए से निकलना चाहता है 
चराग शाम से ही जलना चाहता है 

ख्वाब की तासीर बहुत कम रही है 
अब हकीकत में बदलना चाहता है 

जब तय्य्खुल में जिक्र माजी का हो 
आँख से दरिया पिघलना चाहता है 

वस्ल के लम्हों से रहा था ये गिला 
क्यों वक़्त जल्दी ढलना चाहता है

ऐसा नहीं के मेरी आदत नहीं रहीं 
वो पर मेरे बगैर चलना चाहता है 

गम से महरुमियत यूँ तो नहीं उसे  
पर ''राज़'' यूँ ही बहलना चाहता है

गुनाह था मेरा होना इंसां की जात


ता-उम्र मेरे साथ होते रहे हादसात 
गुनाह था मेरा होना इंसां की जात 

सिसकते हुए सारे चराग बुझ गए 
जाने किस खौफ से गुजरी ये रात 

इश्क की बिसात का था ये हासिल 
हर चाल में मिली मात-मात-मात 

अपने हर्फों में कैसे उतारूँ मैं इसको
मुख़्तसर नहीं ये किस्सा-ए-हयात

गम में भी कोई यूँ मुस्कराए फिरे 
हर किसी को आसाँ नहीं है ये बात 

मंजर-ए-पुरकैफ का दीदार नहीं है 
हजारों गम लिए मिली है कायनात 

बुधवार, दिसंबर 22, 2010

शाम के साए में कोई बादल जैसे


शाम के साए में कोई बादल जैसे 
उसके शानों पे उलझा आँचल जैसे 

सुर्खी फलक पे थी काबिज कुछ यूँ 
गिरा हो उन आँखों से काजल जैसे 

वो खूबसुरत बदन संगमरमरी, वाह 
लगता है पैरहन कोई मलमल जैसे 

उसकी साँसों से हवा यूँ महकी हुई 
घुल गया हो मौसम में संदल जैसे 

सरे बज़्म जिसपे पड़ें नजरें नशीली 
फिरे हर बशर होकर के पागल जैसे 

सोमवार, दिसंबर 20, 2010

तेरे बगैर.....


तन्हा तन्हा सा हुआ हर मंजर तेरे बगैर 
वीरान सा दिखता है अब ये घर तेरे बगैर 

जर्द जर्द सा है मौसम, घटाएं सीली सीली 
धुंआ धुंआ सी लगे है शामो सहर तेरे बगैर

फलक पे चाँद तारों का निशाँ नहीं मिलता
सब खाली खाली सा आता नज़र तेरे बगैर 

गिला किससे करें किसको गम कहें अपना 
हंसती रहती है बस ये चश्मे-तर तेरे बगैर 

सहरा सा हो चला अब तो आलम ये सारा 
कहीं गुल है, ना समर, ना शजर तेरे बगैर 

बेसबब ही भटकते हैं अब तो यहाँ वहां हम 
हावी वहशत है जेहन पे इस कदर तेरे बगैर

गुरुवार, दिसंबर 16, 2010

किसी सहर की ताजगी तुम हो


किसी सहर की ताजगी तुम हो 
गुलों की हसीन सादगी तुम हो 

नहीं जाता मैं सजदे में कहीं पे 
मेरा खुदा तुम हो बंदगी तुम हो 

मेरे तरन्नुम पे रक्स करती हुई 
अब ख्यालों की मौशिकी तुम हो 

यूँ ही नहीं गुम तुम्हारे प्यार में 
मेरी अहद-ए-आशिकी तुम हो 

सांस भी लूँ तो तुम्हारा ख्याल आये 
लगता है के जैसे जिन्दगी तुम हो 

शुक्रवार, दिसंबर 10, 2010

कभी अपने डर से निकला करो


कभी अपने डर से निकला करो 
बे-सबब ही घर से निकला करो 

हम तो हाथ थाम लेंगे तुम्हारा 
इस भरोसे पर से निकला करो 

सिवा दर्द के ये कुछ नहीं देता 
यादों के सफ़र से निकला करो 

गैरों से रख लो तर्के-ताल्लुक 
मेरे भी इधर से निकला करो 

रात में तुम जुगुनू बनकर अब 
अंधेरों के शहर से निकला करो 

इश्क की राहें इतनी आसान नहीं
मियां थोडा सबर से निकला करो 

"राज़" कभी ख्याल भी समझो 
ग़ज़ल-ओ-बहर से निकला करो 

गुरुवार, दिसंबर 09, 2010

अंदाज-ए-बयां और भी शायराना रहता है




अंदाज-ए-बयां और भी शायराना रहता है 
जब उनकी याद और दर्द का ज़माना रहता है 

मेरी आँखें यूँ ही छलक पड़ती हैं अचानक 
जेहनो-दिल में जब कोई लम्हा पुराना रहता है 

मेरे हर्फों में नया कुछ तो होता नहीं अब 
हाल ज़ख्मों का ही बस अपने सुनाना रहता है 

जाने कैसी है खुदा की हमपे ये इनायत 
बर्क की नज़रों में मेरा ही आशियाना रहता है 

दर्द की जब भी बढ़ जाती हैं यूँ ही लज्जतें 
आलमे-वहशत में फिर हर इक दीवाना रहता है 

शुक्रवार, दिसंबर 03, 2010

जिन्दगी.....



जाने कैसी है ये बेरंग जिन्दगी 
चाहता हूँ बस तुम्हारे संग जिन्दगी 


ना सलीका है कोई ना तरीका है 
कट रही है यूँ ही बेढंग जिन्दगी  


मैं इससे और ये है मुझसे उलझी हुई 
ख्यालों से मेरे हुई अब तंग जिन्दगी 


किसी मोड़ पर जीत तो हार है कभी 
उम्र भर को रहेगी क्या जंग जिन्दगी 


ना जाने कब कहाँ ये डोर टूट जाए 
फलक पे उडती जैसे कोई पतंग जिन्दगी 


कोई ख्वाहिश न कर अब इससे 'राज' तू 
काट ले बस यूँ ही होके मलंग जिन्दगी 

बुधवार, नवंबर 24, 2010

क्या कहे.....



है दिल जैसे कोई मुसीबत क्या कहें 
कैसे कटती है शबे फुरकत क्या कहें 

देखकर शरमाये, ना देखे तो भटके 
नहीं माह को कहीं है राहत क्या कहें 

और तेरी याद तो दर्द भी है सुकून भी 
बड़ी अजब सी है ये गफलत क्या कहें 

अजनबी सा लगने लगा हूँ मैं खुद को 
जब से हुई है तुमसे मुहब्बत क्या कहें 

इस बज़्म में तन्हाई सी लगे है अब तो 
इश्क की अजब सी ये वहशत क्या कहें 

कोई नज़रों में सिवा तेरे नहीं उतरता 
इनको भी हुई है तेरी आदत क्या कहें

शुक्रवार, नवंबर 19, 2010

जो दीवाना है वो तो बस दीवाना रहता है


उनके होठों पे फिर इक नया बहाना रहता है 
जब भी किये वादे पे उन्हें ना आना रहता है  

और हम नहीं के उनपे तोहमते लगाया करें 
हमे तो हर लम्हा इंतज़ार में बिताना रहता है 

नाम कुछ भी रख लो, रांझा, मजनू या महिवाल 
जो दीवाना है वो तो बस दीवाना रहता है 

हिज्र में ये आँखें बरसती हैं रात-रात भर 
जेहन में यादों के अब्र का आना-जाना रहता है 

उनके दीद को नज़रें राहों पे लगी रहती हैं 
ख्यालों के साज़ पे बस उनका ही तराना रहता है 

अपनी तन्हाई की बज़्म रास बहुत आती है 'राज़' 
यहाँ का दर्द-ओ-अलम बहुत पहचाना रहता है 

बुधवार, नवंबर 17, 2010

मुझको तो ना जाने कैसा गुमान रहता है


मुझको तो ना जाने कैसा गुमान रहता है 
उसके इंतज़ार में भी, इत्मिनान रहता है 

और उसने छत पे टहलना छोड़ा है जबसे  
उसके शहर का हर शख्स परेशान रहता है 

खलिश किसी रिश्ते में आ गयी जब यारों  
ज़ख्म भर भी जाए मगर निशान रहता है 

मेरे बुजुर्ग जब तलक हैं नज़रों के सामने    
पाओं में ज़मीं है सर पे आसमान रहता है 

इश्क के सफ़र में तो मंजिल नहीं मिलती 
कदम-कदम पे बस नया इम्तेहान रहता है 

उसकी याद और वहशत का आलम ऐसा  
जो कफस में परिंदा कोई बेजुबान रहता है 

जिन्दगी से जब भी उकता गया है ये"राज़" 
फिर लिखता रोज़ वो इक दास्तान रहता है 

सोमवार, नवंबर 15, 2010

मुहब्बत का अजब चलन देख रहा हूँ


मुहब्बत का अजब चलन देख रहा हूँ
आज उस चेहरे पे शिकन देख रहा हूँ

ये कैसी है फिजा में खामोश लहर सी
के शजर के काँधे पे थकन देख रहा हूँ

वो जलना, मचलना, लहराना, बहकना
चराग-ओ-शमा का बांकपन देख रहा हूँ 

रुत-ए-हिज्र और जेहन में याद उसकी
खारों से सज़ा कैसा चमन देख रहा हूँ

झुक गयीं पशेमानी से वो तो ज़फ़ा की
वफ़ा की हवा का खूब फन देख रहा हूँ

आह ने तहरीर को यूँ चूम क्या लिया
दर्द में भी में लुत्फे-सुखन देख रहा हूँ

शुक्रवार, नवंबर 12, 2010

वो मेरा होकर भी मुझसे जुदा रहा


वो मेरा होकर भी मुझसे जुदा रहा 
जब भी मिला बस खफा खफा रहा 

क्या मौसम आये क्या बादल बरसे 
कहाँ ख्याल सर्द आहों के सिवा रहा 

वक़्त ने यूँ मिटा तो दी तहरीरें कई 
सीने का मगर, हर ज़ख़्म हरा रहा 

रात भर शमा अश्कों की जला करी 
सहर कब हुई, ना शब् का पता रहा 

खौफ तन्हाई का यूँ मेरे घर आ गया 
जो उसकी यादों से ही गले लगा रहा 

जिंदा तो हम रहे थे, साँसे भी चलीं थीं 
पर कब दिल सुकूं में उसके बिना रहा 

उठ-उठ कर रातों को रोया किये हम 
हश्र यही "राज़" उम्र भर को बपा रहा 

गुरुवार, नवंबर 11, 2010

उनके तो मिलने ना आने के बहाने हज़ार हैं


उनके तो मिलने ना आने के बहाने हज़ार हैं 
कभी धूप, कभी बारिश, कभी पापा बीमार हैं 

और हम हैं के मान जाते हैं, हर बात उनकी 
क्या करें कमबख्त इश्क के हाथों लाचार हैं 

उन्होंने सहेली के हाथ से संदेसा है भिजवाया 
कैसे आयें हम के दरवाजे पे भैया पहरेदार हैं 

नहीं कर सकती मैं तुम्हे एक भी कॉल जानम 
माँ, भाभी और छोटी की नज़रें खाँ तीसमार हैं 

उनकी गली के कुत्तों को भी हम नहीं हैं सुहाते 
वो भी मुए हिफाज़त करते हुए बहुत खुद्दार हैं 

सोचा था के चाँद--तारों में देखूंगा शक्ल उनकी 
पर अमावस की रात छिप गए सारे मक्कार हैं

उनके आने का यकीं बस स्टॉप पे रहता है इतना 
के लास्ट बस जाने तक करते उनका इंतज़ार हैं 

लोग कहते हैं मुहब्बत में पगला गया है "राज़" 
क्या करें यारों खुशफहमी के हम भी शिकार हैं

शुक्रवार, नवंबर 05, 2010

दिल जो धड़के तो उनको भी खबर हो जाए


दिल जो धड़के तो उनको भी खबर हो जाए 
मेरी जानिब बस उनकी एक नज़र हो जाए 

अब तो तारीकी ही काबिज हैं गलियों में मेरी 
रुख से चिलमन जो ढले शायद सहर हो जाए  

मेरी पलकें गर उठे वो ही नज़र आये मुझे 
लब पे दुआओं का कुछ ऐसा असर हो जाए 

उसके दर्दो-अलम से वाकिफ कुछ ऐसा रहूँ 
वो आह भरे भी तो चाक मेरा जिगर हो जाए 

ऐ खुदा अबके ये बहारें बरसें कुछ ऐसी यहाँ  
सेहरा की शाख पे फिर गुल-ओ-समर हो जाए 

रविवार, अक्तूबर 31, 2010

शाम फिर से मुस्कराने लगी


शाम फिर से मुस्कराने लगी 
उसकी याद जब यूँ आने लगी 

चराग खुद-ब-खुद ही जल उठे 
रौशनी उसे ही गुनगुनाने लगी 

संदली हवा छूके उसके गेसू चली 
सारा आलम घटा महकाने लगी 

रुख से जो उसके आँचल ढलका  
शब् जुगनुओं सी शरमाने लगी 

हंस पड़े थे चमन के फूल सारे 
होठों पे हंसी जो लहराने लगी 

रक्स करता हुआ जर्रा-२ मिला 
वो पाजेब जो छमछमाने लगी 

शुक्रवार, अक्तूबर 29, 2010

क्या मांगू खुदा से जिंदगी के लिए


मिल जाए बस सुकून दो घडी के लिए 
और क्या मांगू खुदा से जिंदगी के लिए 

क्यूँ मुझे वो काफिर का नाम दे देती है 
उसको ही दिल में रखा है बंदगी के लिए 

वो नादान क्या समझे है मोल इसका 
उसे दिल चाहिए बस दिल्लगी के लिए 

दश्तों का सफ़र लिखा है नसीब में गर 
मंजिल नहीं होती उस आदमी के लिए 

सबके लबों पे जिसने तबस्सुम सजाए 
आता नहीं है कोई उसकी ख़ुशी के लिए 

" राज़ " क्या जाया करें मयकदों में अब 
यहाँ अश्क ही काफी हैं मयकशी के लिए 

शनिवार, अक्तूबर 23, 2010

तेरे बगैर.......


बेनूर हर आलम तेरे बगैर 
बेबस सा मौसम तेरे बगैर 

हकीकत क्या फ़साना क्या 
ना ख़ुशी ना गम तेरे बगैर 

चमन में ना रंगों-बू कोई 
गुल ना शबनम तेरे बगैर 

अब हर शय में शक्ल तेरी 
कैसा हुआ भरम तेरे बगैर 

क्या ग़ज़ल क्या नज़्म कहें 
ना लफ़्ज़ों में दम तेरे बगैर 

रुते-हिज्र में तो रोया किये 
सुबहो-शाम हम तेरे बगैर 

अब तमन्ना क्या और करें 
बची जिंदगी कम तेरे बगैर 

रविवार, अक्तूबर 17, 2010

मुलाकातों का पर सिलसिला रखिये


हमसे जफा रखिये या वफ़ा रखिये 
मुलाकातों का पर सिलसिला रखिये 

काफ़िर हैं जो उनको रहने दीजिये 
अपने जेहन में आप तो खुदा रखिये 

शजर के तले जो अँधेरा उतरने लगे 
घर में बस चराग इक जला रखिये 

दिल तोड़ कर के हँसता है बहुत 
अरे नादान है वो खता भुला रखिये 

और रकीब भी हमारे सलामत रहें
जब भी रखिये ये ही दुआ रखिये 

वो भी किसी की माँ, बहन, बेटी है 
सड़क पे चलिए, सर झुका रखिये 

बुढ़ापे में बहुत काम आएगा यारों 
खुद की खातिर भी कुछ बचा रखिये 

किसी पे लगाने से पहले इल्जाम 
अपनी नज़रों में इक आईना रखिये 

उनके मुन्तजिर रहिये ना रहिये 
वादे पे "राज" ऐतबार बना रखिये

शनिवार, अक्तूबर 16, 2010

वो तस्सवुर में हमारे जो आये होंगे


वो तस्सवुर में हमारे जो आये होंगे 
हम बेसबब ही फिर मुस्कराये होंगे 

हवाओं में कैसी खुशबू की लहर उठी 
शायद उसके गेसू कहीं लहराये होंगे 

पायलों के साज़, चूड़ियों के तरन्नुम
सबने बज़्म में नगमे, मेरे गाये होंगे 

अंगडाईयों के वो खुशनुमा तबस्सुम 
शब्-ए-आलम पे नई सहर लाये होंगे 

बर्क-जदा रहती है शोख नजर उनकी 
जिधर डाली होगी शोले भड़काये होंगे 

कोहसारों से क्या ये रिसा है आब सा 
छू के उसने शायद संग पिघलाये होंगे 

मासूम चेहरे पे हैं हजारों तजल्लियां 
आईना देख के खुद भी शरमाये होंगे 

क्या बयां करे तारीफ में 'राज़' तुमसे 
काफिर भी सजदे में सर झुकाये होंगे 

गुरुवार, अक्तूबर 14, 2010

उसपे अब भी मेरा ऐतबार काफी है


उसपे अब भी मेरा ऐतबार काफी है 
इस दिल को भी इंतज़ार काफी है 

मेरे बदन पे ज़ख्मो का सिलसिला 
इश्क में इक यही यादगार काफी है 

ईद और चाँद नज़र आये ना आये 
माशूक का अपनी दीदार काफी है 

ना आज़मा हौसला सितमगर मेरे 
तुझे क्या पता सब्रो-करार काफी है

जफा करके वो भी तो रोया है यारों 
चलो हुआ इतना शर्मसार काफी है

मेरी खातिर अब ऐ चरागारों मेरे 
गम की ये फसल-ए-बहार काफी है 

बुधवार, अक्तूबर 13, 2010

उसकी चूड़ियाँ खनकती बहुत हैं


मैं इस डर से उसका हाथ नहीं थामता 
हैं जो उसकी चूड़ियाँ खनकती बहुत हैं 

वो चाँद शरमा के गिर ना पड़े यूँ कहीं 
जुल्फों की घटायें कुछ बहकती बहुत हैं 

सुना भाभी की नाक है तेज ज्यादा और 
उसके जूड़े की कलियाँ महकती बहुत हैं 

तभी रात ढलने तक छत पे बुलाता नहीं 
कमबख्त मुयी पायलें छनकती बहुत हैं 

ये भी सच के हैं उसकी आँखें बेचैन बड़ी 
बस मुझे ही देखने को मचलती बहुत हैं

किस्मत का लिखा कुछ नहीं होता


किस्मत का लिखा कुछ नहीं होता 
कहने से खुदा खुदा कुछ नहीं होता 

अपनी अपनी फितरत है इंसान की 
करना वफ़ा या जफा कुछ नहीं होता 

घर की ग़ुरबत में भी सुकून रखिये 
जिंदगी में और बजा कुछ नहीं होता 

जिसकी सीरत यहाँ खुबसूरत बहुत 
उसके लिए आईना कुछ नहीं होता 

पैसा नहीं, कमाना है तो नाम कमा
रोज-ए-अज़ल बचा कुछ नहीं होता 

जो रखते हैं जिगर फौलाद का यहाँ पे 
उनको जमीं--आसमाँ कुछ नहीं होता  

मंदिर मस्जिद की छोड़ दे बातें अब 
किसी का उनसे भला कुछ नहीं होता 

वो कभी ना कभी तो मान जायेंगे ही 
बस उनसे दिल लगा, कुछ नहीं होता 

उब जाना जब उस महफ़िल से "राज़" 
तो कह देना अलविदा कुछ नहीं होता 

रविवार, अक्तूबर 10, 2010

मेरा गम यूँ मेरे दिल के ही अंदर रहा


मेरा गम यूँ मेरे दिल के ही अंदर रहा 
फिर भी मैं तो बड़ा मस्त कलंदर रहा 

ये सोच के इश्क में हार जाया किये थे 
के कब जीतकर भी खुश सिकंदर रहा 

जाने क्या रंजिश बादलों की रही हमसे 
के सारा शहर भीगा घर मेरा बंजर रहा 

वो तेरा हाथ छुड़ाना और ख़ामोशी मेरी 
ता--उम्र आँखों में बस यही मंजर रहा 

जब भी नफे नुकसान का हिसाब देखा 
मेरी पीठ पे, मेरे अपनों का खंजर रहा  

तुमको तो बस ना आने का कोई बहाना चाहिए


तुमको तो बस ना आने का कोई बहाना चाहिए 
कभी खुशनुमा सहर, कभी दिन सुहाना चाहिए 

खुद हो क्या बेक़सूर जो उठाते हो तुम उँगलियाँ 
तो यूँ नहीं इल्जाम किसी पर भी लगाना चाहिए 

रिश्तों की शाखों पे ऐसे नहीं समर लगा करते हैं 
कभी तुम्हे भी तो हमारे घर आना-जाना चाहिए 

अपने हालात तुमसे मैं और बयां करूँ कैसे यारों 
भटक रहा हूँ सेहरा में, बस इक ठिकाना चाहिए 

इस जहाँ में अब बसर नहीं होगी ऐ मासूम तेरी 
यहाँ तो जीने की खातिर इंसान सयाना चाहिए 

इश्क का कारोबार तो बड़ा पेचीदा हो गया यहाँ 
दिल हार जाना चाहिए औ नफ़ा कमाना चाहिए 

अरे, मरीज-ऐ-इश्क है ये ''राज़'' उसे दवा ना दो 
उसको तो साथ रिन्दों का और मयखाना चाहिए 

चले आना.....


सेहरा में बन कर तुम फुहार चले आना 
करेंगे फिर इश्क का कारोबार चले आना

जो गम ज़माने में गर दे जाए तुम्हे कोई
ना सोचना कभी तुम एक बार चले आना

और थक जाओ कभी हमसा ढूंढ़ते--ढूंढ़ते
मिलेंगे वँही करते हम इंतज़ार चले आना

मुझे मालूम है तन्हा जीना यूँ आसान नहीं 
जिंदगी का सफ़र हो जाए दुश्वार चले आना

ये चाँद मुआ देखकर तुम्हे भरता है आहें 
छत पे हो उससे जरा होशियार चले आना 

मेरे शानो पे रखके सर सुकूँ पा लेना तुम 
जहन-ओ-दिल हो जब बेक़रार चले आना

कभी"राज़"जो तुम्हे सोचे यूँ ही तन्हाई में 
होकर तुम खुशनुमा इक बहार चले आना 

गुरुवार, अक्तूबर 07, 2010

मुश्किल-ए-जीस्त जब यूँ ही रवाँ होने लगी


 मुश्किल-ए-जीस्त जब यूँ ही रवाँ होने लगी 
ऐ अज़ल अब तू बता क्यूँ मेहरबाँ होने लगी 

वहशते-इश्क़ से फिर हम भी निकलने लगे 
जह्नो-दिल से याद जो उनकी धुआँ होने लगी 

जुस्तजू-ए-सुकूँ में जब दिन सारा कट गया 
शाम होते ही तलाश-ए-आशियाँ होने लगी 

शक्लो-सूरत थी नहीं, मैकप किया लाख का 
खाक को भी अब देख लो आसमाँ होने लगी 

लब हमारे चुप रहे औ उसने भी कुछ ना कहा 
राज़ की हर बात पर आँखों से अयाँ होने लगी 

बज़्म में हमने जब यूँ जिक्र उसका कर दिया 
यार सब कहने लगे,नज़्म जाविदाँ होने लगी 

बारिश-ए-हिज्र देखो दोनों जानिब खूब बरसी 
कुछ यहाँ होने लगी फिर कुछ वहाँ होने लगी 

"राज"तो बेबस रहे अब ये किसकी सुनते फिरें 
जंग दिल और धडकनों के दरमियाँ होने लगी

ना काफिर समझो मुझको ना मुसलमान समझो


ना काफिर समझो मुझको ना मुसलमान समझो
अरे ये कम नहीं कि इंसान हूँ, मुझे इंसान समझो

और जिसके दिल में छुपी होती है सच्ची इबादत
उसे पत्थर में भी मिलता है फिर भगवान् समझो

रखो नीयत पाक और बढाओ भाई -चारे को तुम
इंसानियत को  तुम अपना दीन-ओ-ईमान समझो

नहीं तकसीम है करी इस कायनात ने भी यहाँ
तुम क्यों बाँटते हो मजहब में ऐ नादान समझो

मजलून पे हो जुल्म और खामोश रह जाते हो तुम
फिर भला क्यूँ खुद को मुल्क का सायबान समझो

माना की तल्ख़ होकर कह जाते हो तुम बहुत कुछ 
पर जेहन में जो बसे, वो है मीठी जुबान समझो 

नहीं होती बसर इंसान की कभी इंसान के बगैर 
जिंदगानी है मुश्किल डगर ना इसे आसान समझो

दो लफ्ज़ प्यार के दिन में बस तुम बोल लो गर सबसे
बाँच ली फिर तो तुमने यहाँ गीता-ओ -कुरान समझो

ये सच है, ऐ बज़्म, तुम्हे नहीं पसंद हैं '' राज ''
चलो फिर समझो पागल, वहशी या बदगुमान समझो 

फिरता हूँ अब मैं दर-ब-दर तन्हा


फिरता हूँ अब मैं दर-ब-दर तन्हा
जब से हुआ है मेरा ये घर तन्हा 

वो तो अपनी यादें भी ले कर गया 
कर गया मुझको इस कदर तन्हा  

मौसमे-हिज्र में शाखों पे गुल नहीं 
कैसे करे अब निबाह शजर तन्हा 

कोई गमख्वार नहीं मिलता मुझे 
हो गया जैसे अपना ये शहर तन्हा 

मंजिल का पता न सफ़र का निशाँ 
मिलती है हर इक रहगुजर तन्हा 

वक़्त-ए-रुखसत दोनों रोये बहुत 
थम गया लम्हा रुकी गज़र तन्हा 

कोई आये कफस से आज़ाद करे 
तकती हैं बुलबुलों की नज़र तन्हा 

साकी जिस मयकदे का रूठ गया 
हुई रिंदों की शाम-ओ-सहर तन्हा 

'' राज '' जज्ब की बयानी करें कैसे 
ये ग़ज़ल तन्हा इसकी बहर तन्हा 

बुधवार, अगस्त 25, 2010

आ जाओ कभी तो......


आ जाओ कभी तो दिल को चैन-ओ-करार हो जाए 
आँखों का मुद्दत से चल रहा ख़त्म इंतज़ार हो जाए 
भटक रहा हूँ जाने किसकी तलाश में दश्त-ब-दश्त 
तुमसे मिल लूँ तो शायद सेहरा में भी बहार हो जाए 

कितने लम्हे काटे हैं मैंने तन्हाई के साथ अपनी 
फिरता रहता हूँ कमबख्त रुसवाई के साथ अपनी 
तुम छू लो तो शायद ये मंजर भी गुलज़ार हो जाए 
आ जाओ कभी तो दिल को चैन-ओ-करार हो जाए 

ये सावन की बरखा भी अब मुझको रिझाती नहीं है 
ये बादे--सबा भी दिल को अब मेरे बहलाती नहीं है 
तुम कह दो ना इससे ज़रा,मेरी हम-ख्वार हो जाए 
आ जाओ कभी तो दिल को चैन-ओ-करार हो जाए 

मेरे अल्फाज़ ही दिल के जज्ब बयां करेंगे सब तुमसे 
ना कोई चाहत इसके सिवा हम भी करेंगे अब तुमसे 
तुम्हारे हाथों को चूम लें और खुद पे ऐतबार हो जाए 
आ जाओ कभी तो दिल को चैन-ओ-करार हो जाए

शनिवार, अगस्त 21, 2010

वो हमको और हम उनको भुलाया किये

जब से ख्वाहिश-ओ-अरमान जाया किये 
वो हमको और हम उनको भुलाया किये 

कर गए थे वादा शाम ढले आने का मगर 
सहर तक वो बस आया किये आया किये 


देकर जख्म दिल को भी खुश ना रह सके 
हम होकर बिस्मिल भी, मुस्कराया किये 

यादों का समंदर शब् भर मचला जेहन में 
चरागे-अश्क, जलाया किये, बुझाया किये

जाने किस उम्मीद में सोये नहीं हम कभी 
यही इक था सितम खुद पे बस ढाया किये 

उनकी खातिर बहारों का पैगाम लिख दिया 
घर अपना 'राज' खारों से ही सजाया किये

गुरुवार, अगस्त 19, 2010

अपनी दुआओं में तुझे माँगा है


उड़ती घटाओं में तुझे माँगा है 
महकी फिजाओं में तुझे माँगा है 

जब ही इबादत में हाथ उठायें हैं 
अपनी दुआओं में तुझे माँगा है 

रात ख्वाबों में भी आई हों जब
दिल की सदाओं में तुझे माँगा है 

आईने से जब जी भर गया अपना 
फिर इन निगाहों में तुझे माँगा है 

थके जब सफ़र में तन्हा चलते-२ 
शजर की छावों में तुझे माँगा है

रविवार, अगस्त 15, 2010

वो तो ख्वाबों में भी नजर नहीं आया


वो तो ख्वाबों में भी नजर नहीं आया 
ऐसा बिछड़ा, के लौट कर नहीं आया 

तमाम उम्र भटके हम मुंतजिर उसके 
वो गली नहीं आई,वो शहर नहीं आया 

शब् की सियाही में भी रही थी रौनक 
शफक ही बस इक मेरे दर नहीं आया 

ऐसा फंसा वो शहर की मुश्किलों में 
के माँ कहती रह गयी,घर नहीं आया 

जिसके शानों पे सर रख के रोते हम 
ज़माने में कोई ऐसा बशर नहीं आया 

सरे महफ़िल हम कहते, वाह-२ होती
तहरीर में अपनी वो हुनर नहीं आया 

मुहब्बत का शजर वफ़ा से सींचा तो था 
पर इन शाखों पे कभी समर नहीं आया 

खुदा की फेहरिस्त में शायद आखिरी था 
दुआओं में "राज" तभी असर नहीं आया

शनिवार, अगस्त 14, 2010

ग़ज़ल की है रौनक-ओ-शान "आरज़ू"


मिरी तहरीर की हुई अब जान "आरज़ू" 
ग़ज़ल की है रौनक-ओ-शान "आरज़ू" 

चाँद सितारे सब तेरे ही तो नाम हैं यहाँ 
है खुदा, इबादत और आसमान "आरज़ू" 

गर्मियों में खिलती धूप सरीखी लगे 
सर्दियों में सुकूँ का सायबान "आरज़ू" 

इक यही और क्या बाकी हसरत मेरी 
हो तुझसे ही अब मेरी पहचान "आरज़ू" 

तेरे सामने बैठूं और तुझे ही देखा करूँ 
ज़माने से है दिल में ये अरमान "आरज़ू" 

तेरे ही दर पे करे सजदा शामो-सहर 
"राज" का हुई जब से ईमान ''आरज़ू" 

बुधवार, अगस्त 11, 2010

वक़्त कैसा भी हो निकल जाता है


वक़्त कैसा भी हो निकल जाता है 
संग भी एक रोज पिघल जाता है 

सलीके से मिला करो उस से तुम 
खुदा भी अपने रंग में ढल जाता है 

वो मेरे साथ क्या चल देती है जरा 
ये जमाना कमबख्त जल जाता है 

हौसला बाजुओं में हो जिनके यहाँ 
तूफां भी उनसे रुख बदल जाता है 

क्या मिलाएगा अब आँख मुझसे वो 
बेवफा है, मुँह छुपा निकल जाता है

बर्क उमर भर नही होती फलक पे 
बरसात हुई के सावन टल जाता है 

"राज" समझेगा कभी वो भी जज्बे 
इसी भरोसे पे ही आजकल जाता है

रब याद आया.....


तेरा मिलना--बिछड़ना सब याद आया
तेरा नाम लिया तो फिर रब याद आया

जिसके लिए आँखों में था रतजगा हुआ 
वो तेरी ही याद थी मुझे अब याद आया

नाम तेरा बस गया हो दिल में जिनके 
उन काफिरों को खुदा कब याद आया 

नहीं समायी थी तेरी सूरत उसमे कहीं 
आईना चटकने का वो सबब याद आया 

लगा बैठे थे तुम गैर की मेहँदी पावों में 
मुझसे किया वादा तुम्हे तब याद आया 

"राज" ग़ज़लों में अपने जज्बे कह गए 
किताब का सूखा गुलाब जब याद आया

बुधवार, अगस्त 04, 2010

क़यामत की सहर भी



मेरा हो चला अब दुश्मन उनका शहर भी 
साकी बगैर लगता है ये पैमाना जहर भी 

उनके आने का वादा, बस वादा ही रहा है  
गुजरी हैं कई शामे मेरी मुंतजिर ठहर भी 

बिस्मिल नहीं होती हैं ये शब् के खौफ से 
देखी है इन आँखों ने क़यामत की सहर भी 

हिज्र के मौसम में मेरे ख्वाब क्या बिछड़े 
आता नजर पलकों पे रतजगों का कहर भी 

कुछ लफ़्ज़ों का अफसूँ, हल्की सी बंदिश 
मिल जाती मेरी ग़ज़ल में, थोड़ी बहर भी 
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अफसूँ---Magic

इक और........"आरज़ू"


आँखों में ख्वाब सी पली "आरज़ू" 
रात भर शम्मा सी जली "आरज़ू" 

कभी फलक का तरन्नुम ठहरा हुआ 
कभी बर्क के साए में ढली "आरज़ू"

उसके छूने से गुलों में खुशबू हुई 
खुबसूरत सी महकती कली "आरज़ू"

रंग-ए-शफक उन आँखों से लिया 
सहर ने फिर खुद पे मली "आरज़ू" 

सुकून के दो लम्हे हुए हासिल वहां 
बन गयी खुदा की जब गली "आरज़ू" 

बेखुदी में ' राज ' ने कहा क्या क्या 
ग़ज़लों में आई जब चली "आरज़ू" 

रविवार, जुलाई 25, 2010

खुदा हो तुम....


हम काफिरों के लिए दुआ हो तुम 
यूँ लगता है के जैसे खुदा हो तुम 

शाम तुम्हारे पलकों के साए में है 
सहर इक बहुत खुशनुमा हो तुम 

तुमसे मिलके शजर खुश होते हैं  
सहरा की धूप में ठंडी हवा हो तुम 

गुलों की रौनक तुमसे ही तो है 
चमन की राहत-ऐ-फजा हो तुम 

तुम्हारे नाम की भी कसमे हैं  
दीवानों की अहदे-वफ़ा हो तुम 

बुधवार, जुलाई 21, 2010

मेरा दिल ख्याली है....


मेरी सोच है संजीदा, मेरा दिल ख्याली है 
बेतरतीब सी  मैंने एक दुनिया बना ली है 

तुम आ जाओ और इनको छू लो होठों से 
मेरी ग़ज़ल तुम्हारे बगैर खाली--खाली है 

आँखों में समंदर पर तश्नगी बुझती नहीं 
किसने मेरी जानिब ये बद्दुआ उछाली है 

ये आईना भी कमबख्त वफ़ा नहीं करता 
इसने खुद में तो उनकी सूरत बसा ली है 

उनके दीदार को ये चला आता है शाम से 
चाँद भी अब हो गया, मेरे जैसा बवाली है 

इस बिस्तर में कमबख्त मुझे चुभा क्या 
उनकी नाक का नाथ या कान की बाली है 

और कल से हो रही जो बारिश थमी नहीं 
बादल फूटा है या उसने जुल्फ संभाली है 

नहीं देखते इस डर से सूरते-खूबसूरत को 
"राज" तेरी नजर बहुत ही काली-काली है 

मेरी शामो--सहर आरजू


मेरी शामो--सहर आरजू 
राहों में हमसफ़र आरजू 

जली थी कल भी तो यहाँ 
चराग सी रात भर आरजू 

जब हो जख्म यादों से तो 
बन रहती चारागर आरजू 

सेहरा की धूप में मिलती 
छाँव का हो शजर आरजू 

सुकून देती है, तन्हाई में 
लगे प्यारा सा घर आरजू 

सम्भाल आँखों में रखना 
जाए ना यूँ बिखर आरजू 

अहसासों के फूल जैसी है 
ख्वाबों से भी तर आरजू 

ग़ज़ल तो उससे ही रौशन 
"राज" की है बहर आरजू 

आँखों से जब कई रतजगे निकले


आँखों से जब कई रतजगे निकले 
तब जाके वस्ल के हसीं गुल खिले 

हया की दीवार फिर भी बनी रही 
यूँ तो हमसे बहुत खुल-खुल मिले 

मेरे शानो पे रख सर रोये क्या वो 
गुम हो गए फिर सब शिकवे गिले 

रूहों तक दोनों की साँसे उतर गयीं
रात भर हुए थे बस यही सिलसिले 

बारिशों में भीगे बदन रहे थे दोनों 
अरमान दिलों में जाने कितने पले 

सहर कनखियों से जब आई नजर 
ना हम छोड़ें ना छुड़ाकर के वो चले

कुछ यादें घर में रहने दे


कुछ यादें घर में रहने दे 
तस्वीरें नजर में रहने दे 

फलक ऊँचा हो,होता रहे 
दम-ख़म पर में रहने दे 

आँगन में चराग जला   
शाम,शजर में रहने दे 

आँखें सिर्फ, मंजिलों पर  
गर्द को सफ़र में रहने दे  


चमक उठे हर एक जर्रा 
रौशनी हुनर में रहने दे 

जख्म उनके हँस के सह 
दर्द ये जिगर में रहने दे 

ऊब जाएगा, लौटेगा गाँव 
चार दिन शहर में रहने दे 

वस्ल, लौटने की उम्मीद 
मौसमे-हिजर में रहने दे 

सोमवार, जुलाई 19, 2010

वक्ते-रुखसत अश्कों का समंदर ले चला


वक्ते-रुखसत अश्कों का समंदर ले चला
सहरा सा दिल और आँखें बंजर ले चला 

जाने फिर कब इनसे मुलाकात हो मेरी 
यादों में सूनी गलियां,तन्हा घर ले चला 

उससे शिकवे शिकायतें गिले छोड़ दिए 
दुआ में हाथ,सजदे में झुका सर ले चला 

पैरहन में ताउमर खुशबू बाकी रहने दी 
उसकी सिलवटों का मैं बिस्तर ले चला

वो पत्ते लिपट-२ के शजर से रोये बहुत 
जिन्हें कर जुदा तूफां का कहर ले चला 

गम की आबो-हवा में भी सुकूँ आता है 
इश्क में ये फलसफा मुख़्तसर ले चला 

जब थक गया मेरी ग़ज़लों का चाँद वो
मैं हर्फों में दश्त का सूना मंजर ले चला  

रविवार, जुलाई 18, 2010

उनकी यादों को तो बेधड़क आना है


उनकी यादों को तो बेधड़क आना है 
कमबख्त दिल अपना भी दीवाना है 

उसे बदली की ओट से देख लेता है 
ये मुआ चाँद भी बहुत ही सयाना है 

आफताब को कोई नहीं पूछता अब 
बस इन जुगनुओं का ही जमाना है 

जंगलों की आग शहरों में आ गयी है 
जीने के लिए जो औरों को दबाना है 

ये मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरद्वारे 
सब में रिश्वत का चलन पुराना है 

और जो वाईज बने फिरते हैं यहाँ 
शाम उनके हाथों में भी पैमाना है 

साहिल से क्या दुश्मनी कर लूँ मैं 
रेत पे ही जो घर अपना बनाना है 

इन सितारों को राजदार ना रखो 
इन्हें शाम को आना सुबह जाना है 

कौमी जूनून में दोनों जले बैठे हैं 
उधर है ख़ामोशी, इधर वीराना है

शाम ढले तो घर चले जाना 'राज' 
माँ का आँचल सुकूँ का ठिकाना है 

मेरी आरजू खुदा जैसी है


बद्दुआओं में दुआ जैसी है 
मेरी आरजू खुदा जैसी है 

धुंधली-२ शब् सी मिलती 
कभी बादे---सबा जैसी है 

मेरे दिल का साज भी है 
नगमो की सदा जैसी है 

गुलों का चटख रंग भी है 
कलियों की हया जैसी है 

बदली में चाँद सी लगे है 
तारों की कहकशां जैसी है 

हैं उसके नाम की कसमे 
किसी अहदे-वफ़ा जैसी है 

सोचता हूँ के बार बार करूँ 
खुबसूरत सी खता जैसी है 

बद्दुआओं में दुआ जैसी है 
मेरी आरजू खुदा जैसी है

चाँद ढल रहा है थोडा निखार दे दूँ


अपनी तन्हाई उसको उधार दे दूँ 
चाँद ढल रहा है थोडा निखार दे दूँ 

रुतें बहुत तप के गयीं है तेरे बाद 
क्यों ना इन्हें यादों की बहार दे दूँ 

हद तलक हैं इस दिल की तश्नगी 
चलो मयकदे चलूं इसे करार दे दूँ

उसकी याद आये आंसुओं के साथ  
ये लम्हा आँखों को खुशगवार दे दूँ 

मेरे बगैर कहीं उसका दिल ना लगे 
दुआ अपने दिल से ये बेशुमार दे दूँ 

वो आईना भी जो देखे तो मुझे पाए 
उसके चेहरे पे नक्श यादगार दे दूँ 

शम्म सी हो जाए सुलगती रहा करे 
मौसम-ए-शबनम का इंतजार दे दूँ 

मंगलवार, जुलाई 13, 2010

आरजू.....


मेरी गजलों में रहता तेरा चर्चा-ए-आम आरजू 
कुछ और नहीं आता नजर सुबहो-शाम आरजू 

तुझे मिलके जाने कैसी वहशत हो गयी मुझमे 
तेरी गलियों में फिरता हूँ बस बेमुकाम आरजू 

इक बार मेरा मुकद्दर होने का जो तू वादा कर दे 
सच कहता हूँ दे दूंगा मैं तो कुछ भी दाम आरजू 

सदके तेरे, इबादत तेरी, और तुझे ही खुदा कहूँ 
"हाँ" पर तेरी मैं तो हो जाऊं तेरा गुलाम आरजू 

देखा तुझे जिस रोज से है और कुछ भाता नहीं 
मिट गयीं हैं दिल की थीं जो भी तमाम आरजू 

कुछ और नहीं इसके सिवा, ऐ खुदा वो मांगता 
'राज' ने रखा बस अपनी दुआ का नाम आरजू

आरजू जैसी.....



हुयी जब ग़ज़ल खुशनुमा आरजू जैसी  
हाथ उठे औ निकली दुआ आरजू जैसी  

अब करे काफिर भी सजदा इन्ही पे ही 
के लगती है सूरत-ए-खुदा आरजू जैसी 

सहर होती है उसकी अंगडाईयों से ही
चलती है फिर बादे-सबा आरजू जैसी 

बन जाती है वो तहरीर खुबसूरत बहुत 
जिन हर्फों की हो इब्तिदा आरजू जैसी 

अल्फाज़ ''राज'' के हो जाएँ मुक्क़मल
के मिल जाए ग़ज़ल-सरा आरजू जैसी 

सोमवार, जुलाई 12, 2010

फुरसत में बनाया होगा


ये चेहरा खुदा ने फुरसत में बनाया होगा
फिर देख इसे खुद पे बहुत इतराया होगा 

जुल्फों की उधारी काली घटा से ली होगी 
आरिज के लिए महताब को मनाया होगा 

होठों पे तबस्सुम गुलाब से रख दी होगी 
आँखों की शक्ल में सागर सजाया होगा 

इस जबीं पे फरिश्तों ने सजदे किये होंगे 
काफिरों ने भी दुआ में हाथ उठाया होगा 

और किसी दम जो तुम चले गए होगे यूँ 
आईना भी देख कर तुम्हे शरमाया होगा 

उदास तीरगी भी कहीं छुप ही गयी होगी 
रुख से नकाब यूँ तुमने जब हटाया होगा 

क्या कहे अब अल्फाज़ "राज" के तुमको 
इन्हें ग़ज़ल कहने में पसीना आया होगा 
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