
ग़मों की दौलत बेपनाह हो गयी
जिंदगी अब मेरी गुनाह हो गयी
भटका बहुत मंजिल के लिए मैं
पर हर राह यहाँ गुमराह हो गयी
वही दिनों-रात, वही-शामो सहर
बस कम उसकी निगाह हो गयी
वो खफा हुआ, दुनिया लुट गयी
बेमुकाम फिर मेरी आह हो गयी
शब् की सूरत सा हमदम मिला
तारीकियों की अब चाह हो गयी
मर मर के जिए, जी जी के मरे
कुछ यूँ ही उम्र निबाह हो गयी