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शुक्रवार, जनवरी 01, 2010

तेरा इश्क है पागलपन है, या ये मेरी आदत है


जाने कैसा दीवाना हूँ मैं, जाने कैसी वहशत है
तेरा इश्क है पागलपन है, या ये मेरी आदत है

गुल में तेरा चेहरा देखूं, झील ये आँखें लगती हैं
हर शै में बस तू ही तू, खुदा की कैसी कुदरत है

किस्से लैला मंजनू के मुझको क्यूँ समझाते हो
मेरा इश्क जुदा उनसे जिस से मेरी मुहब्बत है

उसकी खातिर कुछ भी तो अब मैं कर जाऊँगा
शमा के परवाने सी अब हो गयी मेरी हालत है

रात रात भर आँखों में नींद ना आया करती है
उनके ही ये जलवे हैं, ये सब उसकी इनायत है

तनहा-2 बातें करना मुझको अच्छा लगता है
खुद ही खुद के दिल से जाने कैसी गफलत है

रोते रोते हँसता हूँ और हँसते हँसते रो देता हूँ
कोई कहता वहशी हूँ तो कोई कहता शिद्दत है

जाने कैसा दीवाना हूँ मैं, जाने कैसी वहशत है
तेरा इश्क है पागलपन है, या ये मेरी आदत है

4 टिप्‍पणियां:

  1. नये वर्ष की शुभकामनाओं सहित

    आपसे अपेक्षा है कि आप हिन्दी के प्रति अपना मोह नहीं त्यागेंगे और ब्लाग संसार में नित सार्थक लेखन के प्रति सचेत रहेंगे।

    अपने ब्लाग लेखन को विस्तार देने के साथ-साथ नये लोगों को भी ब्लाग लेखन के प्रति जागरूक कर हिन्दी सेवा में अपना योगदान दें।

    आपका लेखन हम सभी को और सार्थकता प्रदान करे, इसी आशा के साथ

    डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

    जय-जय बुन्देलखण्ड

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. रोते रोते हँसता हूँ और हँसते रो देता हूँ... रिश्तों को शिद्दत से अपने अंदर महसूस करा बड़ी बात है..

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