
किसे भूल जाऊं और किसे याद रखूं
सोचता हूँ खुद को ही बस बर्बाद रखूं
और जो मंज़र मुझे रुलाया करते हों
उम्र भर उनको जेहन में आबाद रखूं
वो मुझे दुआ में बद्दुआ देती रहा करे
पूरी हो उसकी दुआ मैं फ़रियाद रखूं
अपने महबूब का सजदा किया करूँ
खुदा को भी अब तो उसके बाद रखूं
नहीं होना मुझे शायर तुम जैसा यारों
बहर से अपनी ये ग़ज़ल आजाद रखूं