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रविवार, फ़रवरी 28, 2016

एक हमीं हैं जो बगावत कर रहे हैं


बिना उस्तरे के हज़ामत कर रहे हैं 
वो शहादत पर सियासत कर रहे हैं 

सच बोल कर कोई जेल जा रहा है 
झूठ वाले देखो वकालत कर रहे हैं 

जिन्हे गरीबों ने साहब बना दिया  
वो अमीरों की हिफाज़त कर रहे हैं 

सब गधे वतनपरस्त हुए जा रहे हैं  
एक हमीं हैं जो बगावत कर रहे हैं 

सोमवार, नवंबर 23, 2015

कैसी चले रहे हो तुम चाल साहब



कैसी चले रहे हो तुम चाल साहब 
कर रहे हो इंसां को हलाल साहब 

चूस कर के खून इन गरीबों का 
हो रहे हो और मालामाल साहब 

ये सियासत कलम से अच्छी नहीं 
शायरी कर ना दे कोई बवाल साहब 

तुम फरेबी हो दगाबाज हो झूठे हो 
दिल में रखने का है मलाल साहब 

"राज" शायर है, फ़कीर है, पागल है
झूठ कहके ना करेगा कमाल साहब 

शुक्रवार, नवंबर 13, 2015

फिर से मौसम को कुछ और अच्छा बनाया जाय



फिर से मौसम को कुछ और अच्छा बनाया जाय 
आओ मोहब्बत का नया सिलसिला बनाया जाय 

जिससे मिलने को हर घड़ी ही बेताब रहे ये दिल
किसी आवारा बादल से चलो रिश्ता बनाया जाय  

ना तुझको हासिल है कुछ, ना मुझको हासिल है 
तो नफरतों को क्यों अपना हिस्सा बनाया जाय 

क्यों हो बेकार में ही बहर-ओ-अदब की तिजारत 
सब के पल्ले पड़े यूँ अशआर हल्का बनाया जाय 

बात सियासी करते हैं पर सियासत नहीं करते 
अब बेवजह ना हम जैसों को नेता बनाया जाय 

आँधियों से भी लड़ने लगे हैं आजकल चराग ये  
ऐसी हकीकत पे चलो कुछ किस्सा बनाया जाय 

कह दीजिये आप अपनी आरज़ू ''राज'' लफ़्ज़ों में  
ग़ज़ल को इस तरह कुछ और मीठा बनाया जाय 

शुक्रवार, अक्तूबर 30, 2015

सर गवाना पड़ सकता है

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कुछ इस तरह ग़मों को छिपाना पड़ सकता है  
दर्द ज्यादा होगा तो मुस्कराना पड़ सकता है  

दस्तार को संभालने की फ़िक्र छोड़ दे ऐ बंदे 
मुश्किल हालात हैं, सर गँवाना पड़ सकता है 

झूठ का कारोबार कर तो रहे हो मगर सोच लो 
कभी सच का भी परचम उठाना पड़ सकता है 

रुठते हो जो तुम तो रूठ जाओ कोई बात नहीं 
याद रखो के हम रूठे तो मनाना पड़ सकता है 

नहीं समझे है मोहब्बत को, रस्म जमाने की 
नाम दिल पे ना लिख, मिटाना पड़ सकता है 

अदावत करो पर जेहन में ये बात रखो "राज "
नज्र मिली तो हाथ भी मिलाना पड़ सकता है 

मंगलवार, मार्च 31, 2015

भारत में




फलता-फूलता खूब साधू संतो का व्यापार भारत में 
क्यों कि फैला है अन्धविश्वास अपरम्पार भारत में 

कहीं मिलता कोई आसा तो कोई देता है बस झांसा
ऐसे करते हैं सभी अपना अपना कारोबार भारत में  

यूँ कहने को तो करोड़ों पैदा हो चुके हैं इस जमीन पे  
आड़े वक़्त मगर नहीं लेता है कोई अवतार भारत में 

गरीबों का हक़ मारकर के अमीरों की जेबें भरती है 
करती है काम गैर-सरकारी, यहाँ सरकार भारत में

कई मजलूम सड़ जाते है बेगुनाही साबित करते-२ 
कई हीरो बने रहते हैं उमर भर, गुनहगार भारत में  

हो जाए कोई हादसा तो कुछ ऐसे पेश आते हैं लोग 
मदद छोड़कर बनाते हैं वीडियो समझदार भारत में 

अजब चलन है 'राज', सच कहिये तो बुरा लगता है 
पूजते हैं पत्थर, करते इन्सां से दुर्व्यवहार भारत में 
KK

शुक्रवार, अगस्त 22, 2014

गरीबों का खून चूस कर हुकूमत चलती है

चलकर हज़ार चालें ये सियासत चलती है 
गरीबों का खून चूस कर हुकूमत चलती है 

साथ ना कोई दौलत, ना शोहरत चलती है 
चलती है साथ तो बस मोहब्बत चलती है 

सुबह लड़ते हैं, शाम को साथ ही खेलते हैं 
बच्चों में जरा देर को ही अदावत चलती है 

वो तो किसी की आँख की हैवानियत ही है 
हया तो जबके ओढ़े हुए शराफत चलती है 

फ़रिश्ते मौत के कभी भी रिश्वत नहीं लेते 
रोजे-अज़ल न किसी की ज़मानत चलती है 

कुछ और नहीं करते, सच बयान करते हैं 
मेरे लफ़्ज़ों से ही मेरी ये बगावत चलती है 

मंगलवार, जुलाई 01, 2014

बन गयी फिर इक कहानी खूबसूरत


बन गयी फिर इक कहानी खूबसूरत 
आँखों ने बहाया जब पानी खूबसूरत

गर पत्थर भी मारिये तो वो हँस देगा 
बहते हुए दरिया की रवानी खूबसूरत

इक शेर में जिक्र जो माँ का कर दिया 
हुयी फिर ग़ज़ल की बयानी खूबसूरत

गठीले जिस्म की नुमाइश भला क्या 
मुल्क पे निसार जो जवानी खूबसूरत

वो जुदा होकर भी मुझसे जुदा नहीं है 
दे गया है यादों की निशानी खूबसूरत

पर्त-दर-पर्त खुल गए 'राज़' किसी के 
मिली है इक तस्वीर पुरानी खूबसूरत

रविवार, सितंबर 08, 2013

गधों का हिन्दुस्तान



मूर्खों का मूर्खिस्तान 
गधों का हिन्दुस्तान
हैं हिंदू, हैं मुसलमान  
नहीं रहा कोई इंसान

पत्थर में बसे देवता 
हाथी जैसा भगवान् 
गधों का हिन्दुस्तान 

कालर है खूब सफ़ेद 
दिल से पर बेईमान 
गधों का हिन्दुस्तान 

सीखे कभी ना कुछ 
बांचे गीता कुरआन 
गधों का हिन्दुस्तान 

फौजी को ना ये पूछें 
हीरो इनका सलमान 
गधों का हिन्दुस्तान 

रोज यूँ कोसें सरकार 
पर वोट करें ये दान 
गधों का हिन्दुस्तान  

मंगलवार, जून 18, 2013

अच्छा होगा या फिर बुरा होगा



अच्छा होगा या फिर बुरा होगा
गर कुछ नहीं तो,  तजर्बा होगा

जिंदगी फ़र्ज़ है निभाते रहिये
ना सोचिये के आगे क्या होगा

लौट-२ कर माजी में ना जाइये
उसे जाना था वो जा चुका होगा

मेरे हक में बस गम ही आये हैं
शायद यही मंजूर-ए-खुदा होगा

इश्तहार जैसा है चेहरा उसका
हर मुसीबत ने पढ़ लिया होगा

यूँ ही नहीं बरसता है ये बादल
किसी की याद में रो रहा होगा

रतजगों की बात करते करते
नींद की जद में आ चुका होगा

उसे जब बाहों में भर लेंगे हम
वो लम्हा क्या खुशनुमा होगा

तुम्हारा लहजा ग़ज़ल में ''राज़''
अपनी आरज़ू कह गया होगा

रविवार, मई 12, 2013

जिससे बिछड़ना था मैं उसी के शहर में था




जुनूँ जाने कैसा वो, उस रोज मेरे सर में था 
जिससे बिछड़ना था मैं उसी के शहर में था 

बेतरतीबी में जीस्त की आराम से गुजरी  
मुश्किल हुआ था वो सफर जो बहर में था 

सहर ने उनको यूँ ही चकनाचूर कर दिया   
रात भर जो भी कुछ ख्व्बीदा नजर में था 

वक़्त की गर्दिश को तो सब आ गया नज़र 
छुपते कहाँ कि सारा जहाँ अपने घर में था 

किसी के कान तक न गईं मासूम की चीखें  
ये सारा शहर कैसी नामर्दी के असर में था  

उसके बगैर मौसम-ए-बहाराँ का क्या करें 
सुकून बहुत उसकी याद की दोपहर में था 

सिवा मुफलिसी के कुछ हासिल नहीं "राज़"
वो शख्स जो बस सादा-हर्फी के नगर में था 


सादा-हर्फी- सच बोलने वाला