
दर्द की इस दिल में एक फुहार चल पड़ी थी
गुलिस्ताँ से रूठ कर जब बहार चल पड़ी थी
आसमाँ तलक मुझे बस सन्नाटा ही मिला
नजर होके जब घर से बेकरार चल पड़ी थी
आँखों में बेसबब ही ख्वाब आते जाते रहे थे
वो नजर करके कैसा कारोबार चल पड़ी थी
जाने क्या जिद के चराग जलता रहा घर में
ये हवा तो उसकी जानिब तैयार चल पड़ी थी
शहर का शहर अजनबी सा लगने लगा मुझे
चंद लम्हें क्या वो साथ में गुजार चल पड़ी थी
हयात से कभी कोई गुजारिश नहीं थी "राज"
तो वो भी देके, इश्क ऐ आजार चल पड़ी थी.