
हमको वो माहे-ईद का दीदार नजर आता है
चिलमन से जब तेरा रुखसार नजर आता है
इस झलक जो तेरी गर कोई देख ले कहीं से
उमर भर वो शख्स मयख्वार नजर आता है
निगाहे-नाज जो अपनी सेहरा पे डाल दो यूँ
वो सेहरा नहीं रहता गुलजार नजर आता है
लब पे जो चली आती है तबस्सुम हलकी-२
तो चमन का हर गुल शर्मशार नजर आता है
आती हो तुम जिसके ख्वाबों में रात रात को
ज़माने को दीवाना शबे बेदार नजर आता है
सजदा जिस रोज से वो करने लगे तुम्हारा
खुदा उस बंदे को फिर बेकार नजर आता है
तेरे हुस्न की तारीफ में अब और क्या कहें
के तेरे आगे हूर भी निगुंसार नजर आता है
खिजां की आँख भी नहीं उठती मेरी जानिब
जबसे "राज" तू रु-ऐ-नौबहार नजर आता है