
अपना दर्द अब हम हर्फों में उतार बैठे हैं
लो फिरसे लिए एक ग़ज़ल तैयार बैठे हैं
लेके जज्बातों को अपने डूब जाने दो हमें
मिले हर खुशी उन्हें जो दरिया पार बैठे हैं
कल तक मंजिल नजर आती थी सामने
आज तो कमबख्त हम राहें भी हार बैठे हैं
ये जख्म-ओ-रुसवाई ये गम-ओ-तन्हाई
मेरे हमसाये बस तो अब यही चार बैठे हैं
रकीबों के हिस्से में गुल आ गए तो क्या
लिखवा के हम नसीबों में जो खार बैठे हैं
मेरे मर्ज का इलाज नहीं रहा बाकी कोई
सजा कर अजीज अब मेरी मजार बैठे हैं