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रविवार, अक्तूबर 31, 2010

शाम फिर से मुस्कराने लगी


शाम फिर से मुस्कराने लगी 
उसकी याद जब यूँ आने लगी 

चराग खुद-ब-खुद ही जल उठे 
रौशनी उसे ही गुनगुनाने लगी 

संदली हवा छूके उसके गेसू चली 
सारा आलम घटा महकाने लगी 

रुख से जो उसके आँचल ढलका  
शब् जुगनुओं सी शरमाने लगी 

हंस पड़े थे चमन के फूल सारे 
होठों पे हंसी जो लहराने लगी 

रक्स करता हुआ जर्रा-२ मिला 
वो पाजेब जो छमछमाने लगी 

14 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (1/11/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा।
    http://charchamanch.blogspot.com

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  2. dil ko chhuti rachnaon se mili ... kya maangu khuda se zindagi ke liye ... kripya yah rachna rasprabha@gmail.com per parichay aur tasweer ke saath bhejen vatvriksh ke liye

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  3. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 02-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

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  4. सुंदर अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

    उत्तर देंहटाएं
  5. Ehsas ji...
    Nutan ji...
    Vandana ji...
    Rashmi ji...
    Anupama ji...
    Sharda ji...
    Sangeeta ji...
    Dorothy ji...
    Upender ji...
    Sameer ji...


    आप सभी का दिल से शुक्र गुजार हूँ...
    आपने अपने कीमती वक़्त में से कुछ इस नाचीज को भी दिया...
    खुश रहें......

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत अद्भुत अहसास...सुन्दर प्रस्तुति .पोस्ट दिल को छू गयी.......कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने..........बहुत खूब,बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये. मधुर भाव लिये भावुक करती रचना,,,,,,

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