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शुक्रवार, नवंबर 13, 2015

फिर से मौसम को कुछ और अच्छा बनाया जाय



फिर से मौसम को कुछ और अच्छा बनाया जाय 
आओ मोहब्बत का नया सिलसिला बनाया जाय 

जिससे मिलने को हर घड़ी ही बेताब रहे ये दिल
किसी आवारा बादल से चलो रिश्ता बनाया जाय  

ना तुझको हासिल है कुछ, ना मुझको हासिल है 
तो नफरतों को क्यों अपना हिस्सा बनाया जाय 

क्यों हो बेकार में ही बहर-ओ-अदब की तिजारत 
सब के पल्ले पड़े यूँ अशआर हल्का बनाया जाय 

बात सियासी करते हैं पर सियासत नहीं करते 
अब बेवजह ना हम जैसों को नेता बनाया जाय 

आँधियों से भी लड़ने लगे हैं आजकल चराग ये  
ऐसी हकीकत पे चलो कुछ किस्सा बनाया जाय 

कह दीजिये आप अपनी आरज़ू ''राज'' लफ़्ज़ों में  
ग़ज़ल को इस तरह कुछ और मीठा बनाया जाय 

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