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मंगलवार, अप्रैल 28, 2009

इक शाम उसकी आँखों से ढल रही होगी




इक शाम उसकी आँखों से ढल रही होगी
हिज्र की रातों में वो बहुत मचल रही होगी...

है नाजुक बदन वो कुछ जियादा ही फिर भी
गम के चराग में रौशनी सी जल रही होगी...

महफिल में बेवजह मेरे नाम के जिक्र पर
सर्द आहें उसकी बर्फ सी पिघल रही होगी...

ना पूछेगी मौसमो से बहारों का वो पता
सेहरा की गर्म रेत पे खामोश चल रही होगी....

के वक़्त भी उसके इन्तेज़ार में रुक गया होगा
और वो हर आहट पे घर से निकल रही होगी...

6 टिप्‍पणियां:

  1. waah waah waah kya baat hai aap to chupe rustam nikle 'KK' ji ,,,,likte rahiye ,,,, hum padte rahenge aur bolte rahenge waah waah........

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  2. सुशांत साहब...बस आप यूँ ही हौसला बढाते रहिये.....

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  3. ek shaam uski aankho se dhal rahi hongi... bahot khb Sanju ji...keep it up... badai sweekaare..!

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  4. aapki ye gazal mujhe bahut bahtu acchi lagi hai.... youn to aap humesha hi accha likhte hain, apr phir bhi iss gazal ki to baat hi kuch aur hai.... :)

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  5. Vartika ji .........shukriya.. hausla badhati rahiye yun hi....

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