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मंगलवार, दिसंबर 20, 2011

हमारे सर पे भी एक आसमान रहता है



हमारे सर पे भी एक आसमान रहता है 
दुआओं सा जो कोई निगहेबान रहता है 

तुम नमाज़ी हो तो क्या समझोगे कभी 
खुदा काफिरों पे कहाँ मेहरबान रहता है 

इस तन्हा शब् को जिसकी याद आती है 
सहर की नमी में उसका निशान रहता है 

उसके आँचल की छाँव ना हो जब तलक  
घर, घर नहीं बनता बस मकान रहता है 

बिछड़कर के मरते तो नहीं हैं हम दोनों 
हाँ, बस जिन्दा रहने का गुमान रहता है 

कुछ और नहीं है ये एहतियातों के सिवा 
जो फासला दोनों के दरमियान रहता है 

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

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  2. तुम नमाज़ी हो तो क्या समझोगे कभी
    खुदा काफिरों पे कहाँ मेहरबान रहता है

    इस तन्हा शब् को जिसकी याद आती है
    सहर की नमी में उसका निशान रहता है।

    सच कहा और जबर्दस्त कहा...
    अगर इच्छा हो तो इसे पढ़ें--- http://kavita-knkayastha.blogspot.com/2010/04/blog-post_06.html

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  3. तुम नमाज़ी हो तो क्या समझोगे कभी
    खुदा काफिरों पे कहाँ मेहरबान रहता है.

    बहुत खूब बात कही है वाह.. वाह..

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  4. आभार आप सभी का, अपना कीमती वक़्त देने के लिए.....

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