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शुक्रवार, मई 13, 2011

इश्क से जब भी वो उकताए फिरेंगे



बेचैन रहेंगे कुछ, कुछ घबराए फिरेंगे 
यूँ इश्क से जब भी वो उकताए फिरेंगे 

काज़ल से करेंगे वो शामो के करिश्मे 
चाँद को चेहरे से फिर चमकाए फिरेंगे 

सखियाँ जो छेड़ देंगी कभी नाम से मेरे 
छुप जायेंगे कहीं पे और शरमाये फिरेंगे 

मौसम की रंगत होगी होठों से ही उनके
पैरहन की खुशबू से सब महकाए फिरेंगे 

रखेंगे नाम-ए-'आरज़ू' ''राज़'' जो उनका 
सच है के हर्फ़-ए-ग़ज़ल बल खाए फिरेंगे 

4 टिप्‍पणियां:

  1. महबूबा की खूबसूरती;खूबसूरत लफ़्ज़ों का जामा पहन और खूबसूरत हो गयी है.........बहुत खूब.....

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  2. संगीता जी.......शुक्रिया
    रश्मि जी........शुक्रिया
    रागिनी जी.......शुक्रिया

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