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बुधवार, मई 04, 2011

फलक पे जो ये घटा सुहानी हुई जाती है



उसकी जुल्फों से ही शैतानी हुई जाती है 
फलक पे जो ये घटा सुहानी हुई जाती है 

के चांदनी बिखर के ज़मीं तलक आ गयी 
खामोश दरिया में इक रवानी हुई जाती है 

किसी चेहरे पे जाके नहीं टिकती हैं आँखें 
वही इक सूरत बस पहचानी हुई जाती है 

चली जाए जो बे-धड़क छत पे वो अपनी 
मुए चाँद को बहुत परेशानी हुई जाती है 

पकड़ लूँ हाथ जो सरे-राह कहीं मैं उसका 
शर्म से बस फिर पानी-पानी हुई जाती है 

मैं उसे खुदा कहूँ या करूँ इबादत उसकी 
क्यूँ यार तुम्हे इतनी हैरानी हुई जाती है 

"राज़" करे ना गर कहीं जिक्र-ए-''आरज़ू''
ग़ज़ल में जैसे कोई बेईमानी हुई जाती है 

9 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (5-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  2. shabd chayan va bhavon men akrupata ,gazak ka nihitarth hota hai , mafi chahenge ,koyi thhes ,ya durbhavana ,mera mantavya nahin hai .prayas achha hai. shukriya ji .

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  3. पकड़ लूँ हाथ जो सरे-राह कहीं मैं उसका
    शर्म से बस फिर पानी-पानी हुई जाती है

    मैं उसे खुदा कहूँ या करूँ इबादत उसकी
    क्यूँ यार तुम्हे इतनी हैरानी हुई जाती है ..waah kya line likhe hai aapne...sidhe dilo dimag me bas gai hai...badhai...

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुरेन्द्र भाई...
    वंदना जी.....
    रचना जी....
    अनुपमा जी.....
    आरती जी....
    अनामिका जी......
    आप सभी का शुक्रिया....
    आपकी आमद हौसला देती रहती है... यूँ ही साथ बनाये रखें....दुआओं के साथ

    और उदय भाई खास तौर से....हकीकत का आईना दिखलाते हुए... मुझे अच्छा लगा... खुश रहिये

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