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सोमवार, अप्रैल 11, 2011

इक गुनाह सा कर गया कोई



के इक गुनाह सा कर गया कोई
इस दिल से जो उतर गया कोई

उसे बस जाने की जिद पड़ी थी
क्या पता कहीं पे मर गया कोई

हवा ये बहकी बहकी फिरे देखो
शायद यहाँ से गुजर गया कोई

चांदनी शब् भर रोती रही यहाँ
इलज़ाम उसके सर गया कोई

खुद को ढूंढ़ते ये कहाँ आ गया
लौट कर जो ना घर गया कोई

उस गली के चक्कर नहीं लगते
शायद "राज़" सुधर गया कोई

6 टिप्‍पणियां:

  1. खुद को धुन्दते ये कहाँ आ गया,
    लौट कर जो ना घर गया कोई.

    बहुत खूब हर एक शेर लाजवाब.

    हवा ये बहकी बहकी फिरे देखो,
    शायद यहाँ से गुजर गया कोई.

    मज़ा आ गया. बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत खूब हर एक शेर लाजवाब.

    उत्तर देंहटाएं
  3. कई दिनों व्यस्त होने के कारण  ब्लॉग पर नहीं आ सका
    बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

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  4. रचना जी......शुक्रिया
    संजय भाई.....शुक्रिया
    मयंक जी......शुक्रिया
    रश्मि जी.......शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं

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