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गुरुवार, मार्च 17, 2011

उसकी खुशबू का फिर से पता देती है


उसकी खुशबू का फिर से पता देती है 

ये सबा चलती है मुझको रुला देती है 

वो भी तड़पती है हिज्र में कहीं बहुत 
मेरे बाद जाने किस को सदा देती है 

वो आते हैं जो शाम तो सुकूँ पाती है 
शाख इक-इक परिंदे को दुआ देती है 

जबके गम में जीना सीख लेता हूँ मैं 
क्यूँ याद दर्द के शोले को हवा देती है 

रोया है वो रात भर तन्हाई में कहीं 
'राज़' ये शबनम सबको बता देती है 

6 टिप्‍पणियां:

  1. वो आते हैं जो शाम तो सुकूँ पाती है
    शाख इक-इक परिंदे को दुआ देती है

    खूबसूरत गज़ल

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  2. बहुत सुन्दर गज़ल..हरेक शेर मर्मस्पर्शी..

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  3. इन खूबसूरत शेरों पर एक मेरा भी ...
    सुबह की खिलती -मुस्कुराती धूप में
    शबनम के चाँद कतरे
    गोया चांदनी ने रात भर आंसू बहाए हो ..!

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  4. संगीता जी.... शुक्रिया

    सुरेन्द्र भाई.... शुक्रिया

    कैलाश साब....शुक्रिया

    वाणी जी...... शुक्रिया और खुबसूरत शेर के लिए आभार

    समीर भाई.... बड़े दिन बाद आपकी आमद हुई... आभार

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