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शनिवार, अप्रैल 23, 2011

माँ की दुआओं को अपने सर रख लेना



माँ की दुआओं को अपने सर रख लेना 
परदेस जाना तो आँख में घर रख लेना 

कहाँ हासिल है शहर में ये सोंधी खुशबू
साथ गली की खाक मुश्त भर रख लेना 

पोंछ लेना आँखों को अपनी मगर तुम 
कुछ आईनों को भी साफ़ कर रख लेना 

जिंदगी में कुछ काम नहीं आया करता 
हौसलों से भरी कोई रहगुजर रख लेना 

बस छाँव ही नहीं, वो देता है बहुत कुछ 
आँगन में कोई बूढ़ा सा शजर रख लेना 

चाहना टूटकर के जिसे भी चाहना तुम
फासला दरमियाँ थोड़ा मगर रख लेना 

मानिंद-ए-चराग जलना ऊम्र भर को यूँ 
पर कुछ हवाओं का भी तो डर रख लेना 

उसका जिक्र भी हुआ तो महकेगी बहुत 
फिर चाहे ग़ज़ल 'राज़' बे-बहर रख लेना

4 टिप्‍पणियां:

  1. dil ko chhuti rachna ... vatvriksh ke liye rasprabha@gmail.com per yah rachna bhejiye tasweer , parichay aur blog link ke saath

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  2. अति उत्तम ,अति सुन्दर और ज्ञान वर्धक है आपका ब्लाग
    बस कमी यही रह गई की आप का ब्लॉग पे मैं पहले क्यों नहीं आया अपने बहुत सार्धक पोस्ट की है इस के लिए अप्प धन्यवाद् के अधिकारी है
    और ह़ा आपसे अनुरोध है की कभी हमारे जेसे ब्लागेर को भी अपने मतों और अपने विचारो से अवगत करवाए और आप मेरे ब्लाग के लिए अपना कीमती वक़त निकले
    दिनेश पारीक
    http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

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  3. हर एक शेर काबिले तारीफ बहुत खूबसूरत गज़ल. बधाई.

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