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बुधवार, अगस्त 03, 2011

पहले ज़ख्मों पर थोड़ा नमक लगा दीजिये



पहले ज़ख्मों पर थोड़ा नमक लगा दीजिये 
फिर जी भरकर आप मुझको दुआ दीजिये 

और कौन यहाँ काफिर है कौन है मुसलमाँ
कभी मिलें गर जो ये मुझे भी बता दीजिये 

मेरी तासीर आब जैसी है पता चल जाएगा 
बस इक बार खुद को मुझमे मिला दीजिये 

कभी जो आँखों में मेरी उसके ख्वाब मिले 
जो चोर की हो वो ही मुझको सज़ा दीजिये  

जिसे लग गया हो आजार-ए-इश्क यहाँ पे 
उसे फिर क्या दुआ दीजिये के दवा दीजिये 

मकता भी संभल जाएगा, खूब शेर जमेंगे  
फ़िक्र बहर की आप,ग़ज़ल से हटा दीजिये 

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर .....प्रभावित करती बेहतरीन पंक्तियाँ ....

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  2. वाह बहुत खूब ...शब्द शब्द बोलता है आपकी ग़ज़ल का

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  3. bahut khubsurat rachana.......man khush ho gya aapki kabita padh ke...pehle jakhmo pe namak laga dijia..fir ji bhar ke duaa dijie..........kya bat hai.........gajb ki rachna.............badhai....

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  4. बढ़िया लिखा है...अच्छा लगा पढ़ कर .

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  5. वाह!!!! जी आप तो छुपे रुस्तम निकले. लाजवाब गज़ल और दिल के करीब से छू कर कुछ अहसास जगा गई.
    बधाई

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  6. वाह्…………बहुत ही शानदार दिल को छूने वाली गज़ल्।

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  7. इश्क के मारों को क्या दुआ क्या दावा ...
    सभी शे'र लाजवाब !

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