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रविवार, जुलाई 18, 2010

उनकी यादों को तो बेधड़क आना है


उनकी यादों को तो बेधड़क आना है 
कमबख्त दिल अपना भी दीवाना है 

उसे बदली की ओट से देख लेता है 
ये मुआ चाँद भी बहुत ही सयाना है 

आफताब को कोई नहीं पूछता अब 
बस इन जुगनुओं का ही जमाना है 

जंगलों की आग शहरों में आ गयी है 
जीने के लिए जो औरों को दबाना है 

ये मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरद्वारे 
सब में रिश्वत का चलन पुराना है 

और जो वाईज बने फिरते हैं यहाँ 
शाम उनके हाथों में भी पैमाना है 

साहिल से क्या दुश्मनी कर लूँ मैं 
रेत पे ही जो घर अपना बनाना है 

इन सितारों को राजदार ना रखो 
इन्हें शाम को आना सुबह जाना है 

कौमी जूनून में दोनों जले बैठे हैं 
उधर है ख़ामोशी, इधर वीराना है

शाम ढले तो घर चले जाना 'राज' 
माँ का आँचल सुकूँ का ठिकाना है 

4 टिप्‍पणियां:

  1. श्याम भाई.......

    जन दुनिया जी.....

    संगीता जी......

    आप सभी का दिल से आभारी हूँ जो आपने अपना कीमती वक़्त दिया....यूँ ही हौसला बढ़ाते रहिये...

    दुआओं के साथ...... खुश रहिये.......KK

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