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मंगलवार, जनवरी 08, 2013

दिल में बाकी पिछली सर्दियाँ रह जायेंगी.....




सूनी, गुमसुम, खामोश बस्तियाँ रह जायेंगी 
खिज़ा आयी तो बस सूखी पत्तियाँ रह जायेंगी 

अबके हिज्र का दिसंबर शायद मैं भुला भी दूं 
पर दिल में बाकी पिछली सर्दियाँ रह जायेंगी 

मुझको मालूम है ये के, तुम न आओगे मगर 
याद करती तुमको मेरी हिचकियाँ रह जायेंगी 

पलट के जब कभी मैं माजी की तरफ देखूंगा
आँखों में लहू, होठों पे सिसकियाँ रह जायेंगी  

है दुआ के खुदा तुमको सुकूँ की जिंदगी बख्शे 
हमारे हक में पुरानी सब चिट्ठियाँ रह जायेंगी 

10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (09-01-13) के चर्चा मंच पर भी है | अवश्य पधारें |
    सूचनार्थ |

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  2. अत्यंत भावपूर्ण रचना...
    लाजवाब...

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  3. सुंदर गज़ल.

    लोहड़ी, मकर संक्रांति और माघ बिहू की शुभकामनायें.

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  4. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 16/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  5. शुक्रिया आप सभी का.....

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