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वो मेरा होकर भी मुझसे जुदा रहा जब भी मिला बस खफा खफा रहा क्या मौसम आये क्या बादल बरसे कहाँ ख्याल सर्द आहों के सिवा रहा वक़्त ने यूँ म...
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जाने कैसा दीवाना हूँ मैं, जाने कैसी वहशत है तेरा इश्क है पागलपन है, या ये मेरी आदत है गुल में तेरा चेहरा देखूं, झील ये आँखें लगती हैं हर शै ...
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हर इक चेहरे में तेरा चेहरा लगे है हिज्र में मुझको सब सेहरा लगे है मेरी हर सदा नाकाम लौट आयी मुझे तो ये खुदा भी बहरा लगे है जाग उठा हू...
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जो भी यहाँ सच की रह-गुजर चले उसके घर पे यारों फिर पत्थर चले मैं दुश्मनों से तो वाकिफ था मगर मेरी पीठ पर दोस्तों के खंजर चल...
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शाम फिर से मुस्कराने लगी उसकी याद जब यूँ आने लगी चराग खुद-ब-खुद ही जल उठे रौशनी उसे ही गुनगुनाने लगी संदली हवा छूके उसके गेसू चली सा...
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जुनूँ जाने कैसा वो, उस रोज मेरे सर में था जिससे बिछड़ना था मैं उसी के शहर में था बेतरतीबी में जीस्त की आराम से गुजरी ...
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झूठ का अब बोलबाला हो गया है और सच का मुँह काला हो गया है चापलूस सर पे जाकर बैठ गए हैं सच्चे का देश निकाला हो गया है ये सिय...
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ख्यालों में आपका आना जाना रात भर फिर चश्मे--तर का मुस्कुराना रात भर हर इक आहट पे है आपकी आमद लगे मेरा दरवाजे तक नज़रें उठाना रात भर आप...
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बन गयी फिर इक कहानी खूबसूरत आँखों ने बहाया जब पानी खूबसूरत गर पत्थर भी मारिये तो वो हँस देगा बहते हुए दरिया की रवानी खूबसू...
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फलता-फूलता खूब साधू संतो का व्यापार भारत में क्यों कि फैला है अन्धविश्वास अपरम्पार भारत में कहीं मिलता कोई आसा तो कोई देता...
शनिवार, दिसंबर 29, 2012
शनिवार, दिसंबर 22, 2012
लम्हों लम्हों में बस ढलता रहा...
लम्हों लम्हों में बस ढलता रहा
ये वक़्त रुका न, फिसलता रहा
जिसने न की कभी क़दर इसकी
वो उम्र भर बस हाथ मलता रहा
गयी रुतें तो, वो पत्ते भी चल दिए
सहरा में तन्हा शजर जलता रहा
दोस्त समझ के जिसे साथ रखा
आस्तीनों में सांप सा पलता रहा
उसकी यादों की गर्मी में, बर्फ सा
रोज कतरा कतरा मैं गलता रहा
मंजिल की दीद हुई न कभी मुझे
ता-उम्र मैं सफ़र पे ही चलता रहा
उसके जाने का गम तो नहीं पर
ना लौटने का वादा खलता रहा
शनिवार, दिसंबर 01, 2012
खिड़कियाँ खोलो के अन्दर रौशनी आये
खिड़कियाँ खोलो के अन्दर रौशनी आये
वीरान घर में फिर से कुछ जिंदगी आये
ख्वाब आँखों के आवारा हुये जाते हैं देखो
शब् से कहो के उनको थोड़ा डांटती आये
खुशबू-ए-अहसास जो लफ़्ज़ों में ढले तो
सफहों पे महकती हुई फिर शायरी आये
मकसद वजूद का यूँ हो जाये मुक़म्मल
काम आदमी के जब कभी आदमी आये
यूँ तो खुदा से कोई दुश्मनी नहीं हैं मगर
रास हमे खुदाई से ज्यादा काफिरी आये
सहरा के सुलगते दिल ये ही सोचते होंगे
कभी दरिया के हक में भी तश्नगी आये
"राज़" कुछ नहीं आरज़ू इक सिवा इसके
के उसकी बांहों में ही सांस आखिरी आये
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