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शुक्रवार, नवंबर 30, 2012

कलम चली है कहीं कोहराम ना कर दे




लफ़्ज़ों की दहशत अजब काम ना कर दे 
ये कलम चली है कहीं कोहराम ना कर दे

बात कडवी मगर सच ही तो रहती हमेशा 
चुप बैठा हूँ, कहीं क़त्ल-ए आम ना कर दे
 
सन्नाटे में गुजर इक हद तक ही है वाजिब 
हद जरा भी बढ़े तो जीना हराम ना कर दे

लत शराब औ' शबाब की अच्छी नहीं होती 
कहीं ये घर बार तक तेरा नीलाम ना कर दे 

जो सियासी लोग हैं उनसे जरा बच के रहिये 
इनसे दोस्ती कहीं आपको बदनाम ना कर दे 

6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    दो दिनों से नेट नहीं चल रहा था। इसलिए कहीं कमेंट करने भी नहीं जा सका। आज नेट की स्पीड ठीक आ गई और रविवार के लिए चर्चा भी शैड्यूल हो गई।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (2-12-2012) के चर्चा मंच-1060 (प्रथा की व्यथा) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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  2. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. अंदाजे बयाँ आपका भी है कातिल,
    शब्दों का कहीं कत्ले-आम न कर दे |

    अति उतम प्रस्तुति

    टिप्स हिंदी में : गूगल ऐनालाइटिक को अपने ब्लॉग पर कैसे स्थापित करें

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  4. बहुत ही बढियां गजल...
    :-)

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