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शुक्रवार, अक्तूबर 12, 2012

ज़माना किस क़दर बेताब है करवट बदलने को...




जब होंगे लोगों के दिल में वलवले मचलने को 
आ जायेंगे वो भी इन्कलाब के रस्ते चलने को 

ऐ सियासतदानों जरा तुम मुड़ कर के तो देखो 
ज़माना किस क़दर बेताब है करवट बदलने को 

बरसों बरस से तुमने तो यहाँ बहुत धूप है सेंकी  
बढ़ रहा है अब मगर दिल्ली का सूरज ढलने को 

लेकर आयेंगे कुछ चराग हम इस नयी सदी से  
जो तैयार होंगे तूफ़ान के साए में भी जलने को 

आ गया है कुछ नया सुरूर अबके तो हवाओं में
तभी तो हर शख्स बेताब है घर से निकलने को

किसी पत्ते ने भी उससे तो रफाकात ना निभायी
शज़र छोड़ आये वो तन्हा पतझर में उबलने को 

यादों की बर्फ पे "राज़" करी है लफ़्ज़ों की गर्मी
 दो चार ग़ज़लें तो है बस अब यूँ ही पिघलने को   

8 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (14-10-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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  2. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 17/10/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  3. वाह...
    बहुत बढ़िया गज़ल....

    अनु

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  4. बिलकुल ठीक!-
    'बुलबुले', 'समन्दर' में,'इनकलाब'लातें हैं |
    छोटे छोटे 'प्रयास',युग' में बदलाव' लाते हैं ||

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