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सोमवार, जुलाई 23, 2012





कटी पतंग सी अब तो मेरी ज़ात है 
बनते-बनते मेरी हर बिगड़ी बात है 

जो ताउम्र किस्मत के भरोसे पे रहा 
बिसाते-वक़्त में तय उसकी मात है 

मैं उसके लिए बस इक खिलौना था 
वो क्या जाने के वो मेरी कायनात है

खुदा ने कब फर्क रखा था इंसां में 
ये तो हम इंसानों की करामात है 

गुजरेगी कैसे अब सोचते हैं "राज़" 
जिन्दगी तनहा सफ़र की रात है

7 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ... बेहतरीन भाव लिए अनुपम प्रस्‍तुति।

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  2. शुक्रिया आप दोनों का....

    माही, वो शायद दिल की बात थी... इसलिए गहरी है.... :)

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  3. बहुत सुन्दर राज जी....
    बेहतरीन गज़ल..

    अनु

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  4. mai to uske liye bas ek khilona raha, vo kya jaane vo mere liye kaynaat thi......waah bahut khoob pagle, achha likha hai
    shubhkamnayen

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  5. अनु जी... शुक्रिया...

    प्रीत.....दिल की बात है.. दिल तक उतरेगी ही..

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