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शुक्रवार, अप्रैल 13, 2012

लफ़्ज़ों में हमने दर्द को बोया हुआ है


बड़ी मुश्किलों से आज सोया हुआ है 
ये दर्द मेरा कितनी रातें रोया हुआ है 

उसकी चाहत बस चाहत ही रह गयी 
ख्वाब में पाया, सच में खोया हुआ है 

निखर के आ गया है चेहरा सहर का 
शब् ने आंसुओं से इसे धोया हुआ है 

देखो के महकती हुई ग़ज़ल आ गयी 
लफ़्ज़ों में हमने दर्द को बोया हुआ है 


3 टिप्‍पणियां:

  1. पिछले कुछ दिनों से अधिक व्यस्त रहा इसलिए आपके ब्लॉग पर आने में देरी के लिए क्षमा चाहता हूँ...

    .......सुन्दर अभिव्यक्ति रचना के लिए बधाई स्वीकारें.!!!

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  2. vey well written ,''dekho ke mahkti hui gazal aa gai,lafzo mein humne dard ko boya huya hae

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  3. आभार आप सभी का.. हौसला अफजाई करते रहें...

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