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सोमवार, जनवरी 23, 2012

सच बता के जा




भले तू यूँ मेरा दिल दुखा के जा
पर जाना है तो सच बता के जा 

यकीं करना है तो कर मुझ पे 
गर शक है तो वो मिटा के जा 

तेरे दिल में भी खलिश ना रहे
शिकवे-गिले सब जता के जा 

मेरी यादें तुझे ना तड़पायें कहीं 
वो पुराने ख़त सारे जला के जा  

तेरे बगैर हम यहाँ जियेंगे कैसे 
जाते-२ कोई हुनर सिखा के जा  

मुझे तो ये तीरगी पसंद है बहुत
चाँद को फिर कहीं छिपा के जा 

हर आँख अश्कबार कर दे "राज़" 
बज़्म में ऐसी ग़ज़ल सुना के जा 

13 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट्स पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  2. वाह बहुत खूब


    लिखने का ये गुर सीखा कहाँ से
    लिखने से पहले हमको ये बता के जा |

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  3. बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

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  4. सुन्दर !
    शुभकामनायें ..
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है
    kalamdaan.blogspot.com

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  5. आप सभी का शुक्रिया जो आपने अपना कीमती वक़्त दिया.....आभार

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  6. सच कह अहि जाना है तो शक मिटा के और सच बता की जाना ही बेहतर है ...
    अच्छे शेर हैं ...

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  7. Raj kaanpuri ji, kya kaha jaye aap ki rachna ki tarif me,koi shbd nahi mil rhe,bahut hi umda likhte hai aap....bdhaai sweeharen...

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  8. शुक्रिया मोनिका जी, दिगम्बर भाई और अवंतिका जी....आभार अपना बहुमूल्य समय देने के लिए ...

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  9. जाते जाते सच बता के जा सरे गिले - शिकवे मिटा के जा
    बहुत बेहतरीन प्रस्तुति
    लाजवाब..
    मेरे ब्लॉग "संस्कार कविता संग्रह" में आपका हार्दिक स्वागत है |

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