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शुक्रवार, दिसंबर 31, 2010

गुनाह था मेरा होना इंसां की जात


ता-उम्र मेरे साथ होते रहे हादसात 
गुनाह था मेरा होना इंसां की जात 

सिसकते हुए सारे चराग बुझ गए 
जाने किस खौफ से गुजरी ये रात 

इश्क की बिसात का था ये हासिल 
हर चाल में मिली मात-मात-मात 

अपने हर्फों में कैसे उतारूँ मैं इसको
मुख़्तसर नहीं ये किस्सा-ए-हयात

गम में भी कोई यूँ मुस्कराए फिरे 
हर किसी को आसाँ नहीं है ये बात 

मंजर-ए-पुरकैफ का दीदार नहीं है 
हजारों गम लिए मिली है कायनात 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बस यही अपराध मै हर बार करता हूँ
    आदमी हूँ आदमी से प्यार करता हूँ

    सुन्दर प्रस्तुति…………नव वर्ष की शुभकामनाएँ।

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  2. संगीता जी...

    वंदना जी...

    शुक्रिया आप दोनों का...

    उत्तर देंहटाएं

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