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शुक्रवार, दिसंबर 31, 2010

शब् के साए से निकलना चाहता है


शब् के साए से निकलना चाहता है 
चराग शाम से ही जलना चाहता है 

ख्वाब की तासीर बहुत कम रही है 
अब हकीकत में बदलना चाहता है 

जब तय्य्खुल में जिक्र माजी का हो 
आँख से दरिया पिघलना चाहता है 

वस्ल के लम्हों से रहा था ये गिला 
क्यों वक़्त जल्दी ढलना चाहता है

ऐसा नहीं के मेरी आदत नहीं रहीं 
वो पर मेरे बगैर चलना चाहता है 

गम से महरुमियत यूँ तो नहीं उसे  
पर ''राज़'' यूँ ही बहलना चाहता है

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत शानदार रचना,बधाई। नया साल मुबारक

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  2. विचारों से ओत-प्रोत सुन्दर रचना!
    नववर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  3. खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.

    अनगिन आशीषों के आलोकवृ्त में
    तय हो सफ़र इस नए बरस का
    प्रभु के अनुग्रह के परिमल से
    सुवासित हो हर पल जीवन का
    मंगलमय कल्याणकारी नव वर्ष
    करे आशीष वृ्ष्टि सुख समृद्धि
    शांति उल्लास की
    आप पर और आपके प्रियजनो पर.

    आप को सपरिवार नव वर्ष २०११ की ढेरों शुभकामनाएं.
    सादर,
    डोरोथी.

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  4. जब तय्य्खुल में जिक्र माजी का हो
    आँख से दरिया पिघलना चाहता है

    वहाँ हर शेर लाजवाब है ......

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  5. प्रिय राज जी
    नव वर्ष की शुभकामना
    आप में शेइर कहने की सलाहियत है थोड़ा और प्रयास करें !

    यह आदत है पुरानी हमको ,मुंह पे बात कहने की
    सभी हैं जान के दुष्मन ,मसिहा भी करेगा क्या

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  6. मसिहा के लिए क्षमा चाहूंगा(मसीहा)

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  7. शुक्रिया आप सभी का....

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