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शुक्रवार, दिसंबर 10, 2010

कभी अपने डर से निकला करो


कभी अपने डर से निकला करो 
बे-सबब ही घर से निकला करो 

हम तो हाथ थाम लेंगे तुम्हारा 
इस भरोसे पर से निकला करो 

सिवा दर्द के ये कुछ नहीं देता 
यादों के सफ़र से निकला करो 

गैरों से रख लो तर्के-ताल्लुक 
मेरे भी इधर से निकला करो 

रात में तुम जुगुनू बनकर अब 
अंधेरों के शहर से निकला करो 

इश्क की राहें इतनी आसान नहीं
मियां थोडा सबर से निकला करो 

"राज़" कभी ख्याल भी समझो 
ग़ज़ल-ओ-बहर से निकला करो 

10 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में

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  2. आपकी यह रचना कल के ( 11-12-2010 ) चर्चा मंच पर है .. कृपया अपनी अमूल्य राय से अवगत कराएँ ...

    http://charchamanch.uchcharan.com
    .

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  3. बेहद भावपूर्ण अभिव्यक्ति ......

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  4. बहुत ही अच्छा.....मेरा ब्लागः-"काव्य-कल्पना" at http://satyamshivam95.blogspot.com/ ....आप आये और मेरा मार्गदर्शन करे...धन्यवाद

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  5. आप सभी का हार्दिक आभार और शुक्रिया..
    जो आपने यहाँ तक आने का कष्ट किया और मेरा हौसला बढाया...
    यूँ ही अपना प्यार और स्नेह बनाये रखें.....

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