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रविवार, अक्तूबर 17, 2010

मुलाकातों का पर सिलसिला रखिये


हमसे जफा रखिये या वफ़ा रखिये 
मुलाकातों का पर सिलसिला रखिये 

काफ़िर हैं जो उनको रहने दीजिये 
अपने जेहन में आप तो खुदा रखिये 

शजर के तले जो अँधेरा उतरने लगे 
घर में बस चराग इक जला रखिये 

दिल तोड़ कर के हँसता है बहुत 
अरे नादान है वो खता भुला रखिये 

और रकीब भी हमारे सलामत रहें
जब भी रखिये ये ही दुआ रखिये 

वो भी किसी की माँ, बहन, बेटी है 
सड़क पे चलिए, सर झुका रखिये 

बुढ़ापे में बहुत काम आएगा यारों 
खुद की खातिर भी कुछ बचा रखिये 

किसी पे लगाने से पहले इल्जाम 
अपनी नज़रों में इक आईना रखिये 

उनके मुन्तजिर रहिये ना रहिये 
वादे पे "राज" ऐतबार बना रखिये

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत दिल से लिखी है .. आपकी कलम ने कमाल किया .. वाह उम्दा.. .2 4 6 7 8 bahut acche lage

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  2. शुक्रिया... 7 नहीं होता तो शायद एक अन्तराल के बाद वाला दूसरा शेर अच्छा बना है.. in ur view -:)

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  3. शुक्रिया अना जी.... बज़्म में शिरकत करने के लिए

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