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शनिवार, अक्तूबर 23, 2010

तेरे बगैर.......


बेनूर हर आलम तेरे बगैर 
बेबस सा मौसम तेरे बगैर 

हकीकत क्या फ़साना क्या 
ना ख़ुशी ना गम तेरे बगैर 

चमन में ना रंगों-बू कोई 
गुल ना शबनम तेरे बगैर 

अब हर शय में शक्ल तेरी 
कैसा हुआ भरम तेरे बगैर 

क्या ग़ज़ल क्या नज़्म कहें 
ना लफ़्ज़ों में दम तेरे बगैर 

रुते-हिज्र में तो रोया किये 
सुबहो-शाम हम तेरे बगैर 

अब तमन्ना क्या और करें 
बची जिंदगी कम तेरे बगैर 

4 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद खूबसूरत शब्द चयन्……………उम्दा भाव संयोजन्…

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  2. umdaa... vaah.. shabd bhi khubsoorti se nibhaye gaye hai... aur bhavnaye bhi boltee hai

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  3. संजय भाई...बस आप का हौसला यूँ ही मिलता रहे ...शुक्रिया

    नूतन जी.... आपके जेहन तक बात उतरी .. कहना सफल रहा..आभार

    अना जी.... रौनक-ए-बज़्म होने के लिए..शुक्रिया

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