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बुधवार, अगस्त 11, 2010

वक़्त कैसा भी हो निकल जाता है


वक़्त कैसा भी हो निकल जाता है 
संग भी एक रोज पिघल जाता है 

सलीके से मिला करो उस से तुम 
खुदा भी अपने रंग में ढल जाता है 

वो मेरे साथ क्या चल देती है जरा 
ये जमाना कमबख्त जल जाता है 

हौसला बाजुओं में हो जिनके यहाँ 
तूफां भी उनसे रुख बदल जाता है 

क्या मिलाएगा अब आँख मुझसे वो 
बेवफा है, मुँह छुपा निकल जाता है

बर्क उमर भर नही होती फलक पे 
बरसात हुई के सावन टल जाता है 

"राज" समझेगा कभी वो भी जज्बे 
इसी भरोसे पे ही आजकल जाता है

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया,
    बड़ी खूबसूरती से कही अपनी बात आपने.....

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  2. आभार......... भाई जी........बस ख्यालों को हर्फ़ दे देता हूँ..
    मुक्कामाल से अभी बहुत बहुत दूर हूँ....

    उत्तर देंहटाएं

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