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मंगलवार, जुलाई 06, 2010

ना शिकवे रख ना गिले रख


ना शिकवे रख ना गिले रख 
दरमियाँ कुछ ना फासले रख 

तन्हा जिन्दगी नहीं कटती है 
मिलने जुलने के सिलसिले रख 

देख दस्तक बहारों की हुई है 
खिड़की-दरवाजे ज़रा खुले रख

तीरगी फिर तीरगी नहीं होगी 
चराग घर में दो चार जले रख 

आँखों से ही सही, जवाब दे ना 
होठों को गर चाहे तो सिले रख 

हिज्र में काम बहुत आयेंगे "राज" 
साथ उनकी यादों के काफिले रख

5 टिप्‍पणियां:

  1. एक एक शेर मन को छूता हुआ....बहुत सुन्दर गज़ल

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  2. Jandunia ji.....shukriya..yaha tak ane ke liye..

    Sangeeta ji.....aap niyamit meri rachnao pe gaur karti hain.....aabhaar...yun hi aate rahel.... hausla badhate rahe....

    aap dono ke liye duaaye... khush rahiye

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  3. आपकी पोस्ट अच्छी लगी, काफी खूबसूरत है

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  4. सृजन जी....शुक्रिया....
    आप यहाँ तक आये और रचना पसंद की ... आभारी हूँ

    उत्तर देंहटाएं

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