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बुधवार, जुलाई 07, 2010

सहर आँखों में भर लायेंगे यारों


सहर आँखों में भर लायेंगे यारों 
के ख्वाबों में असर लायेंगे यारों

अभी तो हमने समझा है ग़ज़ल को 
कभी हम भी बहर लायेंगे यारों

अयादत को चले आयेंगे वो तो 
नजर में हम हुनर लायेंगे यारों

शहर अब अजनबी कैसे रहेगा 
जो हम सबकी खबर लायेंगे यारों

शजर को यूँ नहीं तन्हा रखेंगे 
रुतों से इक समर लायेंगे यारों

नहीं तूफां से घबरा कर रुके जो 
वही खुद में जिगर लायेंगे यारों
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1222 1222 122....बहर 

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