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बुधवार, जुलाई 21, 2010

आँखों से जब कई रतजगे निकले


आँखों से जब कई रतजगे निकले 
तब जाके वस्ल के हसीं गुल खिले 

हया की दीवार फिर भी बनी रही 
यूँ तो हमसे बहुत खुल-खुल मिले 

मेरे शानो पे रख सर रोये क्या वो 
गुम हो गए फिर सब शिकवे गिले 

रूहों तक दोनों की साँसे उतर गयीं
रात भर हुए थे बस यही सिलसिले 

बारिशों में भीगे बदन रहे थे दोनों 
अरमान दिलों में जाने कितने पले 

सहर कनखियों से जब आई नजर 
ना हम छोड़ें ना छुड़ाकर के वो चले

4 टिप्‍पणियां:

  1. संगीता जी......शुक्रिया.

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  2. बहुत पसन्द आया
    हमें भी पढवाने के लिये हार्दिक धन्यवाद
    बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. संजय भाई...बहुत बहुत शुक्रिया... खुश रहिये

    उत्तर देंहटाएं

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