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शनिवार, जुलाई 10, 2010

कहीं उलझे हैं बहुत के नजर नहीं आते


कहीं उलझे हैं बहुत के नजर नहीं आते 
आजकल आप तो हमारे घर नहीं आते 

रोज जाक़े बैठते तो हैं बज्म-ए-गैर में 
दानिश्ता ही क्या मेरे इधर नहीं आते 

तन्हाइयों का कैसा खौफ भर गए तुम 
सुकूँ के लम्हे अब इस शहर नहीं आते 

शजर जो आँधियों में झुका नहीं करते 
उनकी शाखों पर कभी समर नहीं आते 

सब पे नहीं होता खुदा का रहमो-करम 
मेरी जिद पे चाँद--तारे उतर नहीं आते 

वो करते तो हैं वादा शाम ढले आने का 
पर उनके ख्वाब भी रात भर नहीं आते 

पत्थरों में नहीं है दिल ये बात गलत है 
कोहसारों से वरना समन्दर नहीं आते 

हवाओं से अदावत करके भी सलामत 
चरागों के जैसे सब में हुनर नहीं आते 

क्यों मगरूर हो"राज"तुम इन लफ़्ज़ों पे 
क्या कहते ग़ज़ल, ख्याल गर नहीं आते

6 टिप्‍पणियां:

  1. तन्हाईयों का ऐसा खौफ..गज़ब!! बहुत खूब कहा!!

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  2. Jandunia ji...शुक्रिया...मान्यवर....आते रहिएगा

    संगीता जी......हार्दिक आभार...वक़्त दें के लिए...

    समीर भाई....अलफ़ाज़ की गहराई तक गए आप....शुक्रिया

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  3. शजर जो आंधियों मे झुका नहीं करते,उनकी शाख़ों पे समर नहीं आते।
    ख़ूबसूरत मिसरा

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  4. संजय भाई साब....शुक्रिया......यूँ ही महफ़िल में आते जाते रहें..

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