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रविवार, जुलाई 11, 2010

ग़ज़ल


जगती आँखों का ख्वाब ग़ज़ल 
देखो लगती कैसी बेताब ग़ज़ल 

उसको मैं क्या नाम दूँ आखिर
मुझसे कहती माहताब ग़ज़ल 

किसी शाम जब याद यूँ आती 
फिर होकर बहती आब ग़ज़ल 

किसको खोजूं किस से कह दूँ 
बस दर्द का मेरे हिजाब ग़ज़ल 

मौसम की रवायत सी दिखती 
शामो-सहर का आदाब ग़ज़ल 

जिनके यहाँ अल्फाज़ महकते 
उनकी खातिर है गुलाब ग़ज़ल 

जरा सी पी लेते तो बहके रहते 
"राज" की जामो-शराब ग़ज़ल 

7 टिप्‍पणियां:

  1. जिनके यहाँ अल्फाज़ महकते
    उनकी खातिर है गुलाब ग़ज़ल

    मैं तो कहता हूँ कि ये तो है
    शानदार और लाजवाब ग़ज़ल.

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  2. ऍम.वर्मा भाई साब....शुक्रिया......बहुत हौसला दिया आपके लफ़्ज़ों ने.... आभार

    समीर भाई.......शुक्रिया......आपका आना... रौनक-ए-महफ़िल

    संगीता जी....शुक्रिया.....आपने कहके और खुबसूरत कर दी ग़ज़ल....[:)]

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  3. kk bhai apke blog ki sari gazal padi. lagta hai duranto ka signal on ho gaya. bahoot achchhi gazale

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  4. बहुत बढिया.

    जाने नवरात्रे के बारे मे ruma-power.blogspot.com पर

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  5. उपेन्द्र भाई .....यहाँ तक आने के लिए आपका आभारी हूँ.....
    उम्मीद करता हूँ... महफ़िल की रौनक बढ़ाते रहेंगे..शुक्रिया...

    अंजना जी......शुक्रिया....वक़्त देने के लिए

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