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बुधवार, जून 23, 2010

शब् के जख्मों को कुछ सहलाना चाहिए


शब् के जख्मों को कुछ सहलाना चाहिए 
जो शाम बिखरे तो चराग जलाना चाहिए 

नाम इश्क की जमात में लिखवा दिया है 
फिर मौसमे-दर्द में भी मुस्कराना चाहिए 

थक जाओ कभी जब हवा नापते-नापते 
अपने घर तुम्हे फिर लौट जाना चाहिए 

और खुदा--खुदा कहने से कुछ नहीं होता 
सच्ची इबादत हो तो सर झुकाना चाहिए 

छोड़ दो ये नफे-नुकसान की बातें करना 
इस दिल को तो यूँ ही आजमाना चाहिए

सोचती होगी वो कासिद को फिर देखके 
इस बार ख़त उनका जरुर आना चाहिए 

चाँद तारों तक तो अपनी पहुँच नहीं होती 
उनकी ही गली का चक्कर लगाना चाहिए 

जो तुम्हारी जफा के बदले वफ़ा किया करे 
"राज"उनको पलकों पे ही बिठाना चाहिए

8 टिप्‍पणियां:

  1. "बहुत बढ़िया...वाकई में..."

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  2. बहुत बढ़िया ग़ज़ल.....खूबसूरत

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  3. अमित जी......शुक्रिया

    शानू जी........शुक्रिया

    संगीता जी .....शुक्रिया

    महफूज भाई.....शुक्रिया

    आप सब ने वक़्त निकला और यहाँ तक आये....
    दिल से आभारी हूँ.....खुश रहिये इस दुआ के साथ.....

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  4. बढ़िया , शाम बिखरे तो दिले दागदार की बातें
    ऐसे ही तो रोशन होता है सबेरे तक का सफ़र

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  5. शारदा जी......बहुत खुबसूरत अलफ़ाज़ आपके.....

    यहाँ तक आने के लिए शुक्रिया....हौसला देती रहिएगा....

    खुश रहिये...

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  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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