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बुधवार, जून 02, 2010

खो गया है मेरी दीवारों दर का पता




खो गया है मेरी दीवारों दर का पता 
नहीं मिलता मुझे मेरे घर का पता 

यूँ चल तो रहा हूँ दुनिया की भीड़ में 
ना मंजिल का पता ना सफ़र का पता 

जो मिटा दे यहाँ शब् की तासीर को 
ले के आये कोई ऐसी सहर का पता 

ज़माने को क्या फ़िक्र तन्हाई की मेरी 
ढूंढे कौन दश्तो में तन्हा शजर का पता 

यूँ देखकर के आइना मुझे हैंरान क्यूँ है 
क्या मुझमे है किसी वीराँ शहर का पता 

अपने माजी का उसपे क्या इल्जाम दूँ 
रखता हूँ गुमनाम दर्दे-जिगर का पता 

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही उम्दा ग़ज़ल ,,आपके सफल भविष्य का आइना दिखाती हुई ..बधाई
    http://athaah.blogspot.com/

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  2. सुन्दर भावों को बखूबी शब्द जिस खूबसूरती से तराशा है। काबिले तारीफ है।

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  3. राजेंद्र भाई.....और.....संजय भाई,,,,,, दिल से आभार व्यक्त करता हूँ ..
    जो आप नियमित समय निकाल कर मेरी कृति को देखते हैं और उसमे छिपी भावनाओ को समझते हैं....
    खुश रहिये..................शुक्रिया...............दुआओं के साथ

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  4. kahan kahan pe lute ho shumar mat karna
    magar kisi pe bhi ab etibar mat karna
    main lotne ke irade se jaraha hon magar
    safar safar hai mera intizar mat karna

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