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बुधवार, जून 30, 2010

इक खुबसूरत सी किताब लगती हो


इक खुबसूरत सी किताब लगती हो 
चमन का महकता गुलाब लगती हो 

सोचता हूँ क्या नाम दूँ मैं अब तुमको 
चलो कहता हूँ के, माहताब लगती हो 

कभी ख़ुशी हो तो होठों पे खिलती हो 
गम में जो बरसे वो सैलाब लगती हो 

शाम जुल्फों के रंगीन साए में पाले 
सहर का खुशनुमा आदाब लगती हो

और वो इबादत में यूँ हाथ उठाने नहीं 
काफिरों को खुदा का जवाब लगती हो 

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया ....क्या बात है ...

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  2. शुक्रिया, महेंद्र भाई साब..... यहाँ तक आने के लिए...

    आभार समीर भाई जी..... जो आपने वक़्त दिया....

    खुश रहें आप दोनों ......दुआ है....

    उत्तर देंहटाएं

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