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गुरुवार, सितंबर 17, 2009

जब भी ख़त में मौसम लिखना



जब भी ख़त में मौसम लिखना
मुझको उसमे सावन लिखना

खुद को कुरबत सब दे देना
मुझे हिज्र का आलम लिखना

इश्क में तेरे बन बैठे पागल
बात यही तुम हरदम लिखना

बादे सबा जब चले शहर से
आँखे अपनी पुरनम लिखना

सबसे मिलना हंसते रहना
मेरे जानिब सब गम लिखना

लौटूंगा मैं इक रोज देखना
इन्तजार बस कायम लिखना

2 टिप्‍पणियां:

  1. "सबसे मिलना हंसते रहना
    मेरे जानिब सब गम लिखना "

    wah wah...kya baat hai...bhai kamal ki gazal hui hai ye to...bahut khoob...

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