
शब् ने यूँ पलकें बिछा रखीं थी कल
शाम से ही हो रही इक जैसे ग़ज़ल
चाँद चुपके से नदी में आ गया था
महक उठा रौशनी से हर एक पल
मुझको भला क्यूँ सहरा कहता है
गर तू समंदर है तो मेरे साथ चल
मेरे हबीब मुझको कम समझते हैं
जानना हो तो, मेरा रकीब निकल
सब्र आता नहीं मुहब्बत में जिन्हें
भटकते हैं वो उम्र भर होके पागल