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रविवार, जुलाई 04, 2010

हमे मौसमों सा बदलना नहीं आया


हमे मौसमों सा बदलना नहीं आया 
यूँ ज़माने के साथ चलना नहीं आया 

उसका जी भरा खिलौना नया माँगा 
हम थे के कभी मचलना नहीं आया 

इक बार उसे खुदा दिल से कह दिया 
फिर किसी दर पे टहलना नहीं आया 

उसकी ख़ुशी में बस खुश होते गए थे 
इस उलझन से निकलना नहीं आया

उसने गैरों से कह के गम हलके किये 
हमे अश्कों सा  भी ढलना नहीं आया 

'राज' संग नहीं जो टिक पाते मुकाबिल 
जफा की आँधियों में जलना नहीं आया 

2 टिप्‍पणियां:

  1. समीर भाई..शुक्रिया....आपकी शिरकत हमेशा हौसला बढाती है

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