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गुरुवार, मई 13, 2010

उसकी ख़ुशी के लिए खुद को हंसाये रखता हूँ




पलकों के सिरहाने शबनम छिपाये रखता हूँ 
उसकी ख़ुशी के लिए खुद को हंसाये रखता हूँ 

वो गैर की बाहों में जब चैन से सोया करती है 
मैं अपनी आँखों में सावन को उठाये रखता हूँ 

बिस्तर की सिलवटो से खुशबू उसकी आती है 
माजी के खंडहरों में बस आये--जाये रखता हूँ 

जख्म खाकर भी हौसला खोया नहीं करता मैं 
चोट-पे-चोट खाने का जज्बा सजाये रखता हूँ 

उसके हिज्र में वीरानियाँ काबिज तो बहुत हैं 
पर सेहरा को फजा का, पता बताये रखता हूँ 

रंगे शफक जब उफक को चीर जाता है कभी 
अपने घर का रास्ता उसको दिखाये रखता हूँ 

अश्कों की शक्ल में ये जज्बे जब पिघलते हैं 
मैं बस गजलों को ही हमदम बनाये रखता हूँ



3 टिप्‍पणियां:

  1. कई रंगों को समेटे एक खूबसूरत भाव दर्शाती बढ़िया कविता...बधाई

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  2. बेहद ही खुबसूरत और मनमोहक...

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  3. shukriya bhai saab.... hausla afzai ke liye aabhari hu..... duao ke saath

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