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गुरुवार, अक्तूबर 08, 2009

मेरी जानिब से जब भी बहार गुजरी है



मेरी जानिब से जब भी बहार गुजरी है
कर के दिल को बड़ा, बेकरार गुजरी है

वो हंस के रूबरू, हुआ जो कभी गैर से
के ये जिन्दगी फिर तार-तार गुजरी है

ना जाने क्यूँ घर में इक सन्नाटा सा है
शाम-ओ-सहर यूँ तो हजार बार गुजरी है

उसपे तोहमत ना लगे, इसलिए चुप हूँ
पर लबों पे वो दास्ताँ बेशुमार गुजरी है

शायद वो संग पिघल जाएगा अश्कों से
आँख नम करके यही इंतजार गुजरी है

उसने जफा करी है, जिस दम "राज" से
उम्र सारी फिर सबपे बे-ऐतबार गुजरी है

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