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रविवार, मई 03, 2009

मेरे दिल की जिद .....




वो मुझसे जख्म खाने की जिद करता है 
फिर भी हर हाल मुस्कराने की जिद करता है 

लेता है कुछ यूँ मेरे हौसलों का इम्तेहान 
के हर चोट पे नमक लगाने की जिद करता है 

ख्वाहिश खिजाओ से रखता है कुछ यूँ 
तनहा शजर पे गुल खिलाने की जिद करता है 

जब के जानता है वो संग है न पिघलेगा 
फिर भी इक बार और आजमाने की जिद करता है 

गर कभी ख्वाब में वो आ जाए भूल से 
नींद को आँख से न जाने की जिद करता है 

संभल के चलते हैं जब मयकदों से भी 
न जाने क्यूँ "राज" लड़खडाने की जिद करता है 

4 टिप्‍पणियां:

  1. hmmmmm aap itna dard kaise bayan kar dete ho ..... mujhe samajhta hi nahi hai ....... kubh kaho this is gud one

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  2. bas sab dil lagane ka natija hai dost...

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  3. bahut badia
    अच्छा लिखा है आपने , इस शानदार लेखन के लिए बधाई , साथ ही आपका चिटठा भी बहुत खूबसूरत है ,
    इसी तरह लिखते रहे , हमें भी उर्जा मिलेगी ।

    धन्यवाद ,
    मयूर
    अपनी अपनी डगर

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